वांछित मन्त्र चुनें

प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम् । स न॑: पर्ष॒दति॒ द्विष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prāgnaye vācam īraya vṛṣabhāya kṣitīnām | sa naḥ parṣad ati dviṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । अ॒ग्नये॑ । वाच॑म् । ई॒र॒य॒ । वृ॒ष॒भाय॑ । क्षि॒ती॒नाम् । सः । नः॒ । प॒र्ष॒त् । अति॑ । द्विषः॑ ॥ १०.१८७.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:187» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:45» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा सब लोकलोकान्तरों प्राणियों के बाह्य भीतर स्वरूपों को जानता है, दुष्टों को दूर करता है, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (क्षितीनाम्) मनुष्यों के (वृषभाय) सुखवर्षक परमात्मा के लिए (वाचम्) स्तुति को (प्र-ईरय) प्रेरित कर-समर्पित कर (सः) वह (नः) हमारे (द्विषः) द्वेष करनेवालों को (अतिपर्षत्) अत्यन्त दूर कर दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर मनुष्यों का सुखवर्षक-सुख देनेवाला है और हमारे शत्रुओं को हमसे दूर भगानेवाला है, उसकी स्तुति अवश्य करनी चाहिये ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु स्मरण से निर्देषता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्नये) = उस अग्रेणी प्रभु के लिये (वाचम्) = स्तुति वचनों को (प्र ईरय) = प्रकर्षेण उच्चरित कर, उस प्रभु का खूब ही स्तवन कर। जो प्रभु (क्षितीनाम्) = [क्षि निवासगत्योः] गतिशील बनकर अपने निवास को उत्तम बनानेवाले मनुष्यों के लिये (वृषभाय) = सुखों का वर्षण करनेवाले हैं। वस्तुतः प्रभु-स्तवन ही उनके जीवन को उत्तम बनाता है । [२] (सः) = वे प्रभु (नः) = हमें (द्विषः) = द्वेष की भावनाओं से (अतिपर्षत्) = पार पहुँचानेवाले हों । प्रभु का स्मरण मनुष्य को द्वेष से ऊपर उठाता है प्रभु को सर्वत्र देखनेवाला किसी से द्वेष कर ही कैसे सकता है ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु-स्तवन हमें द्वेष से दूर करे।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते सर्वलोकलोकान्तराणां प्राणिनां च बाह्याभ्यन्तर-स्वरूपाणि परमात्मा जानाति दुष्टान् दूरीकरोतीत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (क्षितीनां वृषभाय-अग्नये) मनुष्याणाम् “क्षितयः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] सुखवर्षकाय परमात्मने (वाचं प्र-ईरय) स्तुतिं प्रेरय समर्पय (सः-नः-द्विषः-अतिपर्षत्) सोऽस्माकं द्वेष्टॄन्-अति पारयेत् दूरं कुर्यात् ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O celebrant, sing your song of adoration in honour of Agni, virile, generous and refulgent leader and light giver of humanity. It casts away all our hate, jealousy and all enemies, and thus it washes us clean and immaculate.