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बृह॒स्पति॑र्नयतु दु॒र्गहा॑ ति॒रः पुन॑र्नेषद॒घशं॑साय॒ मन्म॑ । क्षि॒पदश॑स्ति॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॒न्नथा॑ कर॒द्यज॑मानाय॒ शं योः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhaspatir nayatu durgahā tiraḥ punar neṣad aghaśaṁsāya manma | kṣipad aśastim apa durmatiṁ hann athā karad yajamānāya śaṁ yoḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृह॒स्पतिः॑ । न॒य॒तु॒ । दुः॒ऽगहा॑ । ति॒रः । पुनः॑ । ने॒ष॒त् । अ॒घऽशं॑साय । मन्म॑ । क्षि॒पत् । अश॑स्तिम् । अप॑ । दुः॒ऽम॒तिम् । ह॒न् । अथ॑ । क॒र॒त् । यज॑मानाय । शम् । योः ॥ १०.१८२.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:182» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:40» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा दुष्टजनों का तापक, साधुजनों का रक्षक है, वैसे प्रतापी जनों को भी होना चाहिए, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) ब्रह्माण्ड का स्वामी परमात्मा (दुर्गहा) दुर्गमनीय दु:ख का हनन करनेवाला (तिरः-नयतु) उस तिरस्करणीय दुःख को दूर करे (अघशंसाय) पापप्रशंसक के लिए-हमारे अनिष्ट चिन्तक के लिए (मन्म) वधसाधन को (पुनः-नेषत्) पुनः-पुनः फेंके-ले जाये (अशस्तिम्) शस्ति अर्थात सद्भावना से रहित मनुष्य को (अपक्षिपत्) हमसे बाहर निकाल दे (दुर्मतिं हन्) दुर्बुद्धिवाले मनुष्य को नष्ट कर (अथ) और (यजमानाय) आत्मयाजी आत्मसमर्पण करनेवाले-उपासक के लिए (शंयोः) रोगों का शमन और भयों का यावन-दूरीकरण (करत्) करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी गहन दुःख का नष्ट करनेवाला है, अन्य के अहितचिन्तक दुष्ट मनुष्य को वह नष्ट करता है, सद्भावरहित को भी दूर फैंकता है-नष्ट करता है, अपने उपासक का कल्याण करता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शं योः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दुर्गहा) = सब दुर्गमनों का विनाश करनेवाला (बृहस्पतिः) = ज्ञान का स्वामी प्रभु [ब्रह्मणस्पति] मेरे सब दोषों [दुर्गों ] को (तिरः नयतु) = दूर करे, तिरस्कर्त्तव्य पापों को विनष्ट करे । (पुनः) = फिर (अघसंसाय) = बुराई का शंसन करनेवाले के लिये (मन्म) = ज्ञान को नेषत् प्राप्त करायें। ज्ञान के द्वारा उनके विचारों में परिवर्तन हो और वे बुरे को बुरा ही देखने लगें । सद्बुद्धि को प्राप्त करके ये भविष्य में आपका शंसन न करें। [२] वे प्रभु (अशस्तिं क्षिपत्) = अप्रशस्त बात को हमारे से दूर करें । (दुर्मतिम्) = बुरी बुद्धि को (अप हन्) = नष्ट करें। (अथा) = और अब (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिये (शम्) = अग्नि को तथा (योः) = भयों के यावन को (करत्) = करें । पूर्वार्ध में 'दुर्गहा तिरः नमतु' से जो प्रार्थना थी, वही उत्तरार्ध में 'क्षिपत् अशस्तिं' इन शब्दों से हुई है। ' अघशंसाय मन्म नेषत् ' यह प्रार्थना 'दुर्मतिं अप अहन्' इन शब्दों में की गई है। अशान्ति के दूर होने से 'शं' [शान्ति] की प्राप्ति होती है तथा दुर्मति के दूर होने से और सुबुद्धि की प्राप्ति से [योः] भयों का यावन [ दूरीकरण] होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बुराइयों का तिरस्करण करके व अशान्ति को परे फेंककर हम शान्त जीवनवाले हों । दुर्मति को दूर करके और सुबुद्धि को प्राप्त करके हम निर्भयता को प्राप्त हों ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमात्मा दुष्टानां तापकः साधुस्वभावानां रक्षकोऽस्ति तथैव प्रतापिजनैरपि भवितव्यमेवेत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) ब्रह्माण्डस्य स्वामी (दुर्गहा) दुर्गमनीयस्य दुःखस्य हन्ता (तिरः-नयतु) तिरस्करणीयं दूरं नयतु (अघशंसाय मन्म पुनः नेषत्) पापशंसकाय वधसाधनं शस्त्रम् “मन्यतेर्वधकर्मणः” [निरु० १०।२९] पुनः पुनर्नयते (अशस्तिम्-अपक्षिपत्) शस्तिः सद्भावना तद्रहितं जनं बहिर्गमयेत् (दुर्मतिं हन्) दुर्बुद्धिं हन्तु (अथ) अथ च (यजमानाय शंयोः करत्) आत्मयाजिने रोगाणां शमनं भयानाञ्च यावनं कुर्यात् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May Brhaspati, lord of expansive universe, lead us across insufferable suffering and turn the thunderous strike of punishment to the supporter of wickedness, cast away malignity, destroy evil intention, and do good to the yajamana, free him from fear and disease and bestow good health and prosperity on him.