सन्तानों का माता के प्रति कथन [पति के हाथ से धनुष को लेना]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] सन्तान माता से कहते हैं कि (मृतस्य हस्तात्) = मृत के हाथ से (धनुः आददाना उ) = निश्चय से धनुष को ग्रहण करती हुई, (अस्मे) = हमारे (क्षत्राय) = क्षतों से त्राण के लिये, (वर्चसे) = रोगों से संघर्ष करनेवाली व वीर्यशक्ति के लिये, (बलाय) = शत्रुओं से मुकाबिला कर सकनेवाली शारीरिक ताकत के लिये, (अत्र एव) = यहाँ इस लोक में ही, (इह) = इस घर में ही (त्वम्) = तू यत्नशील हो । वस्तुतः माता के अभाव में तो बालक निश्चित रूप से अनाथ हो ही जाएँगे। सो माता को चाहिए कि जिस जीवन संग्राम को वह बच्चों के पिता के साथ मिलकर उत्तमता से चला रही थी, अब बच्चों के पिता श्री के चले जाने पर, उस संग्राम को वह स्वयं अकेली चलाने के लिये तैयारी करे। इसी भावना को यहाँ मन्त्र में 'उनके हाथ से धनुष को लेती हुई' इन शब्दों में कहा गया है। जीवन सचमुच एक संग्राम है। 'इसे उत्तमता से लड़ना, इसमें न घबराना' यह बच्चों की माता का अब मुख्य कर्तव्य हो जाता है। [२] माता ने अपना कर्तव्य ठीक निभाया तो सन्तानों की यह कामना अवश्य पूर्ण होगी कि (वयम्) = हम (सुवीराः) = उत्तम वीर बनकर (विश्वाः) = सब (स्पृधाः) = स्पर्धा करनेवाले (अभिमाती:) = शत्रुओं को जयेम जीत लें। शत्रुओं के विजय करनेवाले सन्तान जहाँ संसार में वास्तविक उन्नति कर पाते हैं, वहाँ वे उन्नत सन्तान अपनी माता की प्रसन्नता का कारण बनते हैं और अपने पिता जी के नाम को उज्वल करनेवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-जीवन-संग्राम को लड़ने के लिये, पिता की मृत्यु पर, माता धनुष को अपने हाथ में ले और अपने सन्तानों के जीवन को क्षत्र वर्चस् व बल से युक्त करके उन्हें शत्रुओं का विजेता बनाये ।