पदार्थान्वयभाषाः - [१] समान्यतः पति को दीर्घजीवी होना चाहिए। पत्नी 'अविधवा' रहे ऐसा गत मन्त्र में कहा था। परन्तु यदि अचानक पति का देहावसान हो जाए तो पत्नी श्मशान में ही न पड़ी रह जाए, मृत पति का ही सदा शोक न करती रहे, अपितु उत्साहयुक्त होकर अपने कर्तव्य कर्मों में लगे । अपने पति की सन्तानों का ध्यान करते हुए वह शोक-मोह को छोड़कर तत्परता से कार्यों में लगी रहे । मन्त्र में कहते हैं कि हे (नारि) = गृह की उन्नति की कारणभूत पत्नि ! तू (उदीर्ष्व) = ऊपर उठ और घर के कार्यों में लग [ईर गतौ], (जीवलोकम् अभि) = इस जीवित संसार का तू ध्यान कर। जो गये, वे तो गये हो । अब तू (गतासुम्) = गत प्राण (एतम्) = इस पति के (उपशेष) = समीप पड़ी है। इस प्रकार शोक का क्या लाभ ? (एहि) = उठ और घर की ओर चल । घर की सब क्रियाओं को ठीक से करनेवाली हो। [२] (हस्तग्राभस्य) = अपने हाथ ग्रहण करनेवाले, (दिधिषोः) = धारण करनेवाले अथवा गर्भ में सन्तान को स्थापित करनेवाले (तव पत्युः) = अपने पति की (इदं जनित्वम्) = इस उत्पादित सन्तान को (अभि) = लक्ष्य करके (संबभूथ) = सम्यक्तया होनेवाली हो । अर्थात् तू अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान कर जिससे सन्तान के पालन व पोषण में किसी प्रकार से तू असमर्थ न हो जाए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यदि अकस्मात् पति गुजर जाएँ तो पत्नी, शोक न करती रहकर, पति के सन्तानों का ध्यान करती हुई, अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिये यत्नशील हो ।