घर में स्त्री का सर्वप्रमुख स्थान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में गृहस्थिति को उत्तम बनाने के लिये उद्योग का संकेत था । गृह की उत्तमता में सर्वप्रथम स्थान स्त्री का है। सो उनका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- (इमा: नारी:) = ये गृह को आगे ले चलनेवाली नारियाँ [नृनये] (अविधवा:) = अविधवा हों । दीर्घजीवी पतियों को प्राप्त करके ये सदा अपने सौभाग्य को स्थिर रखनेवाली हों। साथ ही (सुपत्नी:) = [शोभनाः पत्योः यासाम्] ये उत्तम पतियों वाली हों। जहाँ ये स्वयं पातिव्रत्य धर्म का पालन करनेवाली हों, वहाँ इनके पति भी एक पत्नीव्रत के धर्म को सुन्दरता से निबाहनेवाले हों। [२] ये पत्नियाँ (आञ्जनेन) = शरीर को सर्वतः अलंकृत करनेवाले सर्पिषा घृत के साथ सं विशन्तु घरों में सम्यक् प्रवेश करनेवाली हों । अर्थात् जिस गोघृत के सेवन से शरीर, मन व मस्तिष्क सभी दीप्त बने रहते हैं उस गोघृत की घर में इन्हें कमी न हो। घर में गौ होगी तो जीवन के लिये आवश्यक इन घृत आदि पदार्थों की कमी होगी ही क्यों कर ? [३] इन्हें कभी दरिद्रता के कारण रोना न पड़े। (अनश्रवः) = ये अश्रु वाली न हों। घर में लक्ष्मी के निवास के कारण सदा उल्लास व प्रसन्नता बनी रहे । पति ने श्रम के द्वारा घर को लक्ष्मी का निवास स्थान बना देना है। घर में नमक, तेल व ईंधन का ही रोना न होता रहे । [४] (अनमीवा:) = व्यवस्थित व संयत जीवन के कारण ये सदा नीरोग हों। नीरोग माताएँ ही नीरोग सन्तति को जन्म देती हैं। [५] (सुरत्नाः) = ये स्त्रियाँ उत्तम रमणीय पदार्थों वाली हों अथवा इन्हें उत्तम आभूषणों की कमी न हो। ये (जनयः) = उत्तम सन्तानों को जन्म देनेवाली गृहिणियाँ योनिम् अग्रे आरोहन्तु घर में सर्वमुख्य स्थान में स्थित हों । इनका घर में उचित आदर हो । वस्तुतः घर का निर्माण इन्होंने ही करना है। जितना अधिक इनका उत्तरदायित्व है उतना ही अधिक इनका मान भी है। मनु के शब्दों में एक माता सौ पिताओं के बराबर है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - घरों में स्त्रियों का स्थान प्रमुख हो । इन्हें घर के निर्माण के लिये सब आवश्यक वस्तुएँ सुलभ हों। इनका अपना शरीर पूर्ण स्वस्थ हो ।