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आ रो॑ह॒तायु॑र्ज॒रसं॑ वृणा॒ना अ॑नुपू॒र्वं यत॑माना॒ यति॒ ष्ठ । इ॒ह त्वष्टा॑ सु॒जनि॑मा स॒जोषा॑ दी॒र्घमायु॑: करति जी॒वसे॑ वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā rohatāyur jarasaṁ vṛṇānā anupūrvaṁ yatamānā yati ṣṭha | iha tvaṣṭā sujanimā sajoṣā dīrgham āyuḥ karati jīvase vaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । र॒ह॒त॒ । आयुः॑ । ज॒रस॑म् । वृ॒णा॒नाः । अ॒नु॒ऽपू॒र्वम् । यत॑मानाः । यति॑ । स्थ । इ॒ह । त्वष्टा॑ । सु॒ऽजनि॑मा । स॒ऽजोषाः॑ । दी॒र्घम् । आयुः॑ । क॒र॒ति॒ । जी॒वसे॑ । वः॒ ॥ १०.१८.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:18» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यति) जितने (स्थ) तुम मुमुक्षु हो, सब ही (जरसं वृणानाः) जरावस्था को वरते हुए अर्थात् जरावस्था तक पहुँचते हुए (अनुपूर्वं यतमानाः) पूर्व मुमुक्षुजनों की सरणि के अनुसार आचरण करते हुए (आयुः-आरोहत) जीवन-सोपान पर चढ़ो (इह) इस मोक्षकर्म में (सुजनिमा) शोभन जन्म जिससे होता है, जिसकी उपासना से (सजोषाः) समान प्रीति करनेवाले अर्थात् जितनी प्रीति उपासक करते हैं, उतनी प्रीति परमात्मा भी करता है, ऐसा परमात्मा (त्वष्टा) जगत् का रचयिता जीवात्माओं के कर्मानुरूप फलसम्पादन करनेवाला है (वः-जीवसे) तुम्हारे जीवन के लिए (दीर्घम्-आयुः करति) दीर्घ मोक्षविषयक आयु करता है, देता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सभी मुमुक्षु आत्माओं को जरा अवस्था तक पहुँचाता है, जबकि वे मुमुक्षुओं की सरणि के अनुसार आचरण करते हों। जितनी प्रीति मुमुक्षु परमात्मा से करते हैं, परमात्मा भी उनसे उतनी ही प्रीति करता है और उन्हें दीर्घायु प्रदान करता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निरन्तर उद्योगशील

पदार्थान्वयभाषाः - [१] एक घर में रहने वालों को सम्बोधन करते हुए कहते हैं कि (यतिष्ठ) = आप जितने भी हो वे (अनुपूर्वं) = क्रमशः (यतमानाः) = गृह की स्थिति को उत्तम बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करते हुए (आयुः आरोहत) = आयु में आगे और आगे बढ़नेवाले होवो । (जरसं वृणाना:) = आप जरावस्था का वरण करनेवाले बनो। यौवन में ही आपका जीवन समाप्त न हो जाए। पिता के बाद पुत्र आता है । पिता ने जैसे घर को अच्छा बनाने का यत्न किया था । पुत्र ने उस गृह स्थिति में और उन्नति के लिये प्रयत्न करना है। पिता अपना कार्य करके चला जाता है, अब पुत्र ने भी अपने कार्य को यथाशक्ति सम्पन्न करते हुए जीवन में आगे बढ़ना है। घर में यह आना और जाना अनुपूर्व बना रहे । कभी पिता के सामने पुत्र की मृत्यु न हो। [२] (इह) = यहाँ संसार में (सुजनिमा) = उत्तम जन्मों को देनेवाला (सजोषाः) = सदा हमारे साथ हृदयों में प्रीतिपूर्वक निवास करनेवाला (त्वष्टा) = वह निर्माता देव ! (जीवसे) = उत्तम जीवन के लिये (वः) = आप सब की (दीर्घम् आयुः) = दीर्घ आयु को (करति) = करते हैं। प्रभु कृपा से हमारा जीवन उत्तम बनता है, विशेषकर तब जब कि हम उस प्रभु को अपने साथ संगत अनुभव करते हैं। |
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने घरों में सदा उत्तम स्थिति के लिये प्रयत्न करते हुए, आगे बढ़ें। प्रभु से संगत हुए हुए जीवन को उत्तम बनाएँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यति) यावन्तः ‘यत् शब्दात् डतिप्रत्ययश्छान्दसः (स्थ) यूयं मुमुक्षवः-भवथ सर्वे खल्वपि (जरसं वृणानाः) जरावस्थां वृण्वन्तः (अनुपूर्वं यतमानाः) पूर्वेषां मुमुक्षूणां सरणिमनु तेषामिवाचरणं कुर्वन्तः (आयुः-आरोहत) जीवनसोपानमुपरि गच्छत (इह) अस्मिन् मोक्षार्थकर्मणि (सुजनिमा) शोभनं जन्म यस्मात् भवति यस्योपासनेन जायते सः (सजोषाः) समानं प्रीतिकराः, यावतीं प्रीतिमुपासकाः कुर्वन्ति तावतीं प्रीतिं सोऽपि करोति तथाभूतः (त्वष्टा) विश्वस्य जगतो रचयिता जीवात्मनां कर्मानुरूपं फलं सम्पादयिता परमात्मा (वः जीवसे) युष्माकं जीवनाय (दीर्घम्-आयुः करति) दीर्घं मोक्षविषयकमायुर्जीवनं करोति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Go forward high on course of life choosing a full age unto completion and fulfilment in the order of succession and renewal from former to latter, living in discipline actively, all of you, as many as you are. Nobly born here in life, living together in piety with love and devotion as you are, Tvashta, the cosmic maker, ordains a full life of long years for you to live in joy.