पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जिस प्रकार (अहानि) = दिन (अनुपूर्वम्) = अनुक्रम से (भवन्ति) = परिवृत्त होते रहते हैं, अर्थात् जैसे एक दिन के बाद दूसरा दिन आ जाता है और उससे लगा हुआ तीसरा दिन । और इस प्रकार यह दिनों का क्रम चलता ही जाता है, (एवा) = इसी प्रकार (धातः) = हे हम सब का धारण करनेवाले प्रभो ! (एषाम्) = इन मन्त्र के ऋषि 'संकुसुक यामायन' लोगों के [ कुस् to embrace] आपका आलिंगन करनेवाले संयमी पुरुषों के (आयूंषि) = जीवनों को कल्पय बनाइये। इनका जीवन भी समय से पूर्व विच्छिन्न न हो जाए। [२] (यथा) = जैसे (ऋतवः) = ऋतुएँ (ऋतुभिः) = ऋतुओं के साथ (साधु यन्ति) = उत्तमता से चलती हैं, 'वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त व शिशिर' का क्रम अविच्छिन्न रूप से चलता जाता है, इसी प्रकार हे विधातः ! इन स्वभक्तों के जीवनों को भी आप मध्य में ही विच्छिन्न न होने दीजिये। ये अपने जीवन के प्रयाणों के चक्र को, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास को पूरा कर ही पायें। [३] (यथा) = जैसे (पूर्वम्) = पूर्व काल में उत्पन्न हुए पिता को (अपरः) = अर्वाक् काल में होनेवाला सन्तान (न जहाति) = नहीं छोड़ता है, अर्थात् पिता से पूर्व ही जीवन को समाप्त करके चला नहीं जाता है, इस प्रकार हे प्रभो ! इन स्वभक्तों के जीवनों को बनाइये। पहले आनेवाला पहले ही जाए। कोई भी व्यक्ति यौवन में ही समाप्त-जीवनवाला न हो जाए। प्रभु की कृपा से प्रभु-भक्तों के जीवन अविच्छिन्न रूप से अन्ततक चलनेवाले हों और वे जीवन के चक्र को पूर्ण करके ही आयुष्य को समाप्त करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमारी जीवन यात्रा मध्य में ही विच्छिन्न न हो जाए। पुत्र कभी पिता से पूर्व ही चला न जाए।