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यथाहा॑न्यनुपू॒र्वं भव॑न्ति॒ यथ॑ ऋ॒तव॑ ऋ॒तुभि॒र्यन्ति॑ सा॒धु । यथा॒ न पूर्व॒मप॑रो॒ जहा॑त्ये॒वा धा॑त॒रायूं॑षि कल्पयैषाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathāhāny anupūrvam bhavanti yatha ṛtava ṛtubhir yanti sādhu | yathā na pūrvam aparo jahāty evā dhātar āyūṁṣi kalpayaiṣām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । अहा॑नि । अ॒नु॒ऽपू॒र्वम् । भव॑न्ति । यथा॑ । ऋ॒तवः॑ । ऋ॒तुऽभिः॑ । य॒न्ति॑ । सा॒धु । यथा॑ । न । पूर्व॑म् । अप॑रः । जहा॑ति । ए॒व । धा॒तः॒ । आयूं॑षि । क॒ल्प॒य॒ । ए॒षाम् ॥ १०.१८.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:18» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा-अहानि-अनुपूर्वं भवन्ति) जैसे दिन प्रातः से सायं पर्यन्त होकर निरन्तर दिन अर्थात् दिन-रात क्रम से चलते हैं-प्रवृत्त होते हैं (यथा-ऋतवः-ऋतुभिः साधु यन्ति) जैसे वसन्तादि ऋतुएँ परस्पर ऋतुओं के साथ क्रमशः प्रवृत्त होती हैं-चलती हैं (यथा पूर्वम्-अपरः-न जहाति) जैसे वंश में पूर्वभावी पिता आदि को पिछला पुत्र नहीं त्यागता, जिससे कि पूर्वभावी पिता आदि का पश्चात् भावी पुत्र होता है-इस प्रकार वंश-परम्परा होती है (एव धातः एषाम्-आयूंषि-कल्पय) धाता विधाता परमात्मा ! इन मुमुक्षुओं की आयु तथा जीवनों को आगे-आगे सिद्ध कर-सफल-समृद्ध कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे दिन-रात आनुपूर्वी क्रम से निरन्तर होते रहते हैं तथा जैसे ऋतुएँ एक दूसरे क्रम से चलती रहती हैं अथवा जैसे पुर्वोत्पन्न पिता के पश्चात् पुत्र और पुत्र भावी पिता के पीछे उसका पुत्र वंश-परम्परा से होते रहते हैं, इसी प्रकार मुमुक्षुओं के जीवन भी आगे-आगे चलते रहते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अर्विच्छन्न व पूर्ण जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जिस प्रकार (अहानि) = दिन (अनुपूर्वम्) = अनुक्रम से (भवन्ति) = परिवृत्त होते रहते हैं, अर्थात् जैसे एक दिन के बाद दूसरा दिन आ जाता है और उससे लगा हुआ तीसरा दिन । और इस प्रकार यह दिनों का क्रम चलता ही जाता है, (एवा) = इसी प्रकार (धातः) = हे हम सब का धारण करनेवाले प्रभो ! (एषाम्) = इन मन्त्र के ऋषि 'संकुसुक यामायन' लोगों के [ कुस् to embrace] आपका आलिंगन करनेवाले संयमी पुरुषों के (आयूंषि) = जीवनों को कल्पय बनाइये। इनका जीवन भी समय से पूर्व विच्छिन्न न हो जाए। [२] (यथा) = जैसे (ऋतवः) = ऋतुएँ (ऋतुभिः) = ऋतुओं के साथ (साधु यन्ति) = उत्तमता से चलती हैं, 'वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त व शिशिर' का क्रम अविच्छिन्न रूप से चलता जाता है, इसी प्रकार हे विधातः ! इन स्वभक्तों के जीवनों को भी आप मध्य में ही विच्छिन्न न होने दीजिये। ये अपने जीवन के प्रयाणों के चक्र को, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास को पूरा कर ही पायें। [३] (यथा) = जैसे (पूर्वम्) = पूर्व काल में उत्पन्न हुए पिता को (अपरः) = अर्वाक् काल में होनेवाला सन्तान (न जहाति) = नहीं छोड़ता है, अर्थात् पिता से पूर्व ही जीवन को समाप्त करके चला नहीं जाता है, इस प्रकार हे प्रभो ! इन स्वभक्तों के जीवनों को बनाइये। पहले आनेवाला पहले ही जाए। कोई भी व्यक्ति यौवन में ही समाप्त-जीवनवाला न हो जाए। प्रभु की कृपा से प्रभु-भक्तों के जीवन अविच्छिन्न रूप से अन्ततक चलनेवाले हों और वे जीवन के चक्र को पूर्ण करके ही आयुष्य को समाप्त करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमारी जीवन यात्रा मध्य में ही विच्छिन्न न हो जाए। पुत्र कभी पिता से पूर्व ही चला न जाए।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा-अहानि-अनुपूर्वं भवन्ति) यथा हि दिनानि प्रातरारभ्य सायमिति यावत्, अहानि खल्वहोरात्राणि क्रमानुरोधेन प्रवर्तन्ते (यथा-ऋतवः-ऋतुभिः साधु यन्ति) यथा हि खल्वृतवो वसन्तादयः-ऋतुभिः क्रमैः सम्यक् प्रवर्तन्ते (यथा पूर्वम्-अपरः न जहाति) यथैव वंशे पूर्वभाविनं पितरमपरः पुत्रो न त्यजति यतः पूर्वं पितरमपेक्ष्य हि पुत्रो भवतीति वंशपरम्परा भवति (एव धातः-एषाम्-आयूंषि कल्पय) एषां मुमुक्षूणां जीवनानि-अग्रेऽग्रे सिद्धानि कुरु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as days follow in succession, the latter following the former and the former living on in the latter, just as seasons go on by order of the seasons of the year, just as the successor does not and cannot forsake the predecessor, so in the same order, O lord ordainer and sustainer of humanity, order and sustain the life line of these people.