वांछित मन्त्र चुनें

प॒तं॒गो वाचं॒ मन॑सा बिभर्ति॒ तां ग॑न्ध॒र्वो॑ऽवद॒द्गर्भे॑ अ॒न्तः । तां द्योत॑मानां स्व॒र्यं॑ मनी॒षामृ॒तस्य॑ प॒दे क॒वयो॒ नि पा॑न्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pataṁgo vācam manasā bibharti tāṁ gandharvo vadad garbhe antaḥ | tāṁ dyotamānāṁ svaryam manīṣām ṛtasya pade kavayo ni pānti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒त॒ङ्गः । वाच॑म् । मन॑सा । बि॒भ॒र्ति॒ । तान् । ग॒न्ध॒र्वः॑ । अ॒व॒द॒त् । गर्भे॑ । अ॒न्तरिति॑ । ताम् । द्योत॑मानाम् । स्व॒र्य॑म् । म॒नी॒षाम् । ऋ॒तस्य॑ । प॒दे । क॒वयः॑ । नि । पा॒न्ति॒ ॥ १०.१७७.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:177» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:35» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पतङ्ग) जीवात्मा (वाचम्) वाणी को (मनसा) मन से मननवृत्ति से (बिभर्ति) धारण करता है (ताम्) उस वाणी को (गन्धर्वः) प्राणवायु (गर्भे-अन्तः) अपने अन्दर (अवदत्) बोलता है (तां द्योतमानाम्) उस प्रकट होती हुई को (मनीषाम्) मनोगत को (कवयः) मेधावी जन (ऋतस्य पदे स्वर्यम्) ज्ञान के स्वरवाले प्राप्तव्य पद पर (नि पान्ति) नियत रखते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - जीवात्मा अपनी मननशक्ति से वाणी को धारण करता है, ध्यान में लाता है, पुनः प्राण वायु उसका अन्दर से उत्थान करता है, जब यह बाहर प्रकट होती है, तो मेधावी जन ज्ञान से स्वरवाले पद पर उसे सुरक्षित रखते हैं अर्थात् ज्ञान के उपयोग में लाते हैं ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋत का पालन व वेदज्ञान की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पतङ्गः) = कर्मों को करता हुआ और अतएव विविध योनियों में जानेवाला यह जीव जब (मनसा) = मनन शक्ति के द्वारा (वाचम्) = ज्ञान की वाणी को (बिभर्ति) = धारण करता है तो (ताम्) = उस ज्ञान की वाणी को (गर्भे अन्तः) = अन्दर ही हृदय में स्थित हुआ हुआ (गन्धर्वः) = [गां धारयति] ज्ञान की वाणियों को धारण करनेवाला प्रभु (अवदत्) = उच्चारित करता है । [२] (ताम्) = उस (द्योतमानाम्) = देदीप्यमान (स्वर्यम्) = प्रकाश को प्राप्त करानेवाली (मनीषाम्) = [मनसः ईशिनीम् ] मन का शासन करनेवाली वेदवाणी को (कवयः) = ज्ञानी लोग (ऋतस्य पदे) = सत्य के मार्ग में (निपान्ति) = नितरां रक्षित करते हैं। ऋत के मार्ग पर चलते हुए इस ज्ञान की वाणी को अपने में धारण करते हैं। ऋत का पालन उस उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्ति का साधन है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदयस्थ प्रभु ज्ञान की वाणी का उच्चारण करते हैं । ऋत का पालन करनेवाले इस वाणी को प्राप्त करते हैं।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पतङ्गः-वाचं मनसा बिभर्ति) जीवात्मा वाचं मनसा मननवृत्त्या धारयति (तां गन्धर्वः-गर्भे-अन्तः-अवदत्) तां वाचं प्राणवायुः “प्राणो वै गन्धर्वः” [जै० उ० ३।६।८।३] स्वमध्ये वदति “मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम्” [पाणिनीय शिक्षा० ७] (तां द्योतमानां-मनीषाम्) तां प्रकाशमानां मनोवशाम् (कवयः-ऋतस्य पदे स्वर्यं नि पान्ति) मेधाविनो जना ज्ञानस्य प्राप्तव्ये स्वर्ये पदे “स्वर्यमिति सप्तम्यां द्वितीया छान्दसी” नियतं रक्षन्ति ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Patanga, the soul flying in various forms, bears the eternal Vak, divine Word, at the depth of its mind. Vak is the voice which Parameshvara, sustainer of the voice and the universe, speaks to the soul at the heart of existence. That same resonant and refulgent voice and its awareness, wise visionaries retain, hear and enjoy in the state of samadhi communion at the centre of the ultimate truth of existence.