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प्र सू॒नव॑ ऋभू॒णां बृ॒हन्न॑वन्त वृ॒जना॑ । क्षामा॒ ये वि॒श्वधा॑य॒सोऽश्न॑न्धे॒नुं न मा॒तर॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra sūnava ṛbhūṇām bṛhan navanta vṛjanā | kṣāmā ye viśvadhāyaso śnan dhenuṁ na mātaram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । सू॒नवः॑ । ऋ॒भू॒णाम् । बृ॒हत् । न॒व॒न्त॒ । वृ॒जना॑ । क्षाम॑ । ये । वि॒श्वऽधा॑यसः । अश्न॑न् । धे॒नुम् । न । मा॒तर॑म् ॥ १०.१७६.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:176» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:34» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में विद्वान् परमेश्वर की वेदवाणी से उसकी स्तुति करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, विज्ञानरीति द्वारा सूर्य से ज्ञान प्राप्त करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभूणाम्) बहुत भासमान रश्मियाँ चमकनेवाली किरणों या मेधावी विद्वान् (सूनवः) उत्पादन धर्मवाले या ज्ञान के प्रेरक (बृहत्-वृजना) महान् बलों को (प्र नवन्त) प्रचलित करते हैं, बढ़ाते हैं (विश्वधायसः) विश्व जगत् को धारण करनेवाले (क्षाम) पृथिवी को (धेनुं न मातरम्) जैसे दूध देनेवाली गोमाता को प्राप्त करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - किरणें संसार में उत्पत्ति शक्ति देनेवाली जगत् को धारण करती हैं, वे पृथिवी को प्राप्त होती हैं, जैसे दूध देनेवाली गौ को बछड़े प्राप्त करते हैं एवं मेधावी विद्वान् ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले ज्ञानबल का प्रचार करते हैं, पृथ्वी की जनता को ज्ञान देने के लिए प्राप्त होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अ- मांस भोजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋभूणां सूनवः) = [उरु भान्ति इति ऋभवः] ऋभुओं के सून, अर्थात् खूब ही चमकने- वाले ये लोग (बृहत्) = खूब (वृजना) = बलों को (प्र नवन्त) = प्रकर्षेण प्राप्त होते हैं। प्रभु से प्रेरणा को प्राप्त करके ये ज्ञान के मार्ग पर चलते हैं और इस प्रकार जीवन में व्यसनों से बचकर खूब शक्तिशाली बनते हैं। [२] ये ऋभु वे हैं (ये) = जो (विश्वधायसः) = सब के धारक होते हुए (मातरं क्षां आ अश्नन्) = इस मातृ तुल्य पृथिवी से ही अपने भोजन को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार (न) = जैसे कि बछड़े (मातरं धेनुम्) = अपनी मातृभूत गौ से गोदुग्धरूप भोजन को प्राप्त करते हैं। वस्तुतः ऋभुओं का भोजन पृथिवी से उत्पन्न वानस्पतिक पदार्थ ही हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ऋभु वासनाओं से बचकर बड़ी शक्ति का संग्रह करते हैं और वानस्पतिक भोजन को करते हुए सबका धारण करनेवाले होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते विद्वांसः परमेश्वरस्य वेदवाचा तस्य स्तुतिं कृत्वा मोक्षानन्दं प्राप्नुवन्ति तथा विज्ञानप्रक्रियया सूर्याद् बहुज्ञानं गृह्णन्तीति विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभूणां) ऋभवः ‘विभक्तिव्यत्ययेन प्रथमास्थाने षष्ठी’ बहुभासमाना रश्मयः “ऋभवः-किरणाः” [ऋ० १।११०।६ दयानन्दः] मेधाविनो वा “ऋभु मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (सूनवः) उत्पादनधर्मिणः ज्ञानस्य सोतारः प्रेरकाः (बृहत्-वृजना प्र नवन्त) बृहन्ति महान्ति बलानि “वृजनं बलनाम” [निघ० २।६] प्रचरन्ति “नवते-गतिकर्मा” [निघ० २।१४] (विश्वधायसः) विश्वस्य जगतो धारकाः (ये) ये खलु (क्षाम) पृथिवीम् “क्षाम पृथिवीनाम” [नि० १।१] (धेनुं न मातरम्-अश्नन्) यथा दुग्धदात्रीं मातरं गां च तथा प्राप्नुवन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The children and disciples of Rbhus, expert makers, celebrate their mighty achievements of science and technology and, sustainers of world community, children of mother earth, they reach and explore the earth for service and resources like calves rushing to mother cows.