शत्रुओं [सपत्नों, अरातियों, पृतन्यन् व इरस्यन् व्यक्तियों] से राज्य का रक्षण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र के अन्दर जो राजा को हटाकर स्वयं आसन सम्भालना चाहते हैं वे 'सपत्न' कहलाते हैं। प्रजावर्ग में जो अदानवृत्तिवाले हैं, जो कर आदि को बचाने का प्रयत्न करते हैं, वे ' अराति' हैं। राजा को चाहिये कि इन दोनों को पहले समाप्त करे। इनको समाप्त करके ही वह बाह्य शत्रुओं पर आक्रमण में सफल होगा। [२] सपत्नान् गद्दी के दावेदार अन्य शत्रुभूत व्यक्तियों को अभिवृत्य = घेरकर अथवा उनपर आक्रमण करके और याः = जो नः = हमारे में से अरातयः = कर आदि को ठीक रूप से न देने की वृत्तिवाले हैं उनको घेरकर, कैद करके पृतन्यन्तम् = फौज के द्वारा आक्रमण करनेवाले का अभितिष्ठ - मुकाबिला कर, उनके आक्रमण से देश की रक्षा कर । [२] वस्तुतः राष्ट्र के अन्दर की स्थिति ठीक होने पर ही बाह्य शत्रुओं से युद्ध किया जा सकता है। उसका भी तो अभि [तिष्ठ] = मुकाबिला कर यः = जो नः इरस्यति - हमारे साथ ईर्ष्या करता है। ईर्ष्या के कारण राष्ट्र को हानि पहुँचानेवाला भी तेरे लिये आक्रमणीय है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सपत्नों व अरातियों को कैद में डालकर ही बाह्य शत्रुओं के साथ युद्ध प्रारम्भ करना चाहिये ।