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अ॒भि॒वृत्य॑ स॒पत्ना॑न॒भि या नो॒ अरा॑तयः । अ॒भि पृ॑त॒न्यन्तं॑ तिष्ठा॒भि यो न॑ इर॒स्यति॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhivṛtya sapatnān abhi yā no arātayaḥ | abhi pṛtanyantaṁ tiṣṭhābhi yo na irasyati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि॒ऽवृत्य॑ । स॒ऽपत्ना॑न् । अ॒भि । याः । नः॒ । अरा॑तयः । अ॒भि । पृ॒त॒न्यन्त॑म् । ति॒ष्ठ॒ । अ॒भि । यः । नः॒ । इ॒र॒स्यति॑ ॥ १०.१७४.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:174» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:32» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सपत्नान्) शत्रुओं पर (अभिवृत्य) आक्रमण करके (नः) हमारे (याः-अरातयः) जो शत्रुता करनेवाली-हमारी धन सम्पत्ति का हरण करनेवाली जो शत्रुसेना है, उस पर आक्रमण करके (पृतन्यन्तम्) हमारे साथ संग्राम करते हुए शत्रुगण पर (अभि०) आक्रमण करके तथा (यः) जो (नः) हम पर (इरस्यति) ईर्ष्या करता है, उस पर (अभि तिष्ठ) आक्रमण करके स्वाधीन कर, स्ववश कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शत्रु कौन है, परसेना क्या-क्या अपहरण कर रही है और संग्राम करता हुआ शत्रुगण कितना है और कौन-कौन राष्ट्र के अन्दर इर्ष्या करनेवाले हैं, उन सबको अपने अधीन करे ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शत्रुओं [सपत्नों, अरातियों, पृतन्यन् व इरस्यन् व्यक्तियों] से राज्य का रक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र के अन्दर जो राजा को हटाकर स्वयं आसन सम्भालना चाहते हैं वे 'सपत्न' कहलाते हैं। प्रजावर्ग में जो अदानवृत्तिवाले हैं, जो कर आदि को बचाने का प्रयत्न करते हैं, वे ' अराति' हैं। राजा को चाहिये कि इन दोनों को पहले समाप्त करे। इनको समाप्त करके ही वह बाह्य शत्रुओं पर आक्रमण में सफल होगा। [२] सपत्नान् गद्दी के दावेदार अन्य शत्रुभूत व्यक्तियों को अभिवृत्य = घेरकर अथवा उनपर आक्रमण करके और याः = जो नः = हमारे में से अरातयः = कर आदि को ठीक रूप से न देने की वृत्तिवाले हैं उनको घेरकर, कैद करके पृतन्यन्तम् = फौज के द्वारा आक्रमण करनेवाले का अभितिष्ठ - मुकाबिला कर, उनके आक्रमण से देश की रक्षा कर । [२] वस्तुतः राष्ट्र के अन्दर की स्थिति ठीक होने पर ही बाह्य शत्रुओं से युद्ध किया जा सकता है। उसका भी तो अभि [तिष्ठ] = मुकाबिला कर यः = जो नः इरस्यति - हमारे साथ ईर्ष्या करता है। ईर्ष्या के कारण राष्ट्र को हानि पहुँचानेवाला भी तेरे लिये आक्रमणीय है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सपत्नों व अरातियों को कैद में डालकर ही बाह्य शत्रुओं के साथ युद्ध प्रारम्भ करना चाहिये ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सपत्नान्) शत्रून् (अभिवृत्य) आक्रम्य (नः याः-अरातयः) अस्माकं या खलु अदानवृत्तिकाः, अपि तु हरणकर्त्र्यः परसेनाः (अभि०) अभिवृत्य-आक्रम्य (पृतन्यन्तम्) संङ्ग्रामं कुर्वन्तं गणम् (अभि०) अभिवृत्य आक्रम्य (यः-नः) योऽस्मान् (इरस्यति) ईर्ष्यति “इरस् ईर्ष्यायाम्” [कण्ड्वादि०] तम् (अभितिष्ठं) स्वाधीनी कुरु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O ruler commander of the nation, having surrounded and cornered the adversaries, our selfish exploiters, whoever want to wage war against us, or who hate and envy to down us, break down their force and rule over them.