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इ॒हैवैधि॒ माप॑ च्योष्ठा॒: पर्व॑त इ॒वावि॑चाचलिः । इन्द्र॑ इवे॒ह ध्रु॒वस्ति॑ष्ठे॒ह रा॒ष्ट्रमु॑ धारय ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ihaivaidhi māpa cyoṣṭhāḥ parvata ivāvicācaliḥ | indra iveha dhruvas tiṣṭheha rāṣṭram u dhāraya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒ह । ए॒व । ए॒धि॒ । मा । अप॑ । च्यो॒ष्ठाः॒ । पर्व॑तःऽइव । अवि॑ऽचाचलिः । इन्द्र॑ऽइव । इ॒ह । ध्रु॒वः । ति॒ष्ठ॒ । इ॒ह । रा॒ष्ट्रम् । ऊँ॒ इति॑ । धा॒र॒य॒ ॥ १०.१७३.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:173» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:31» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इह-एव) इस राष्ट्र में ही (एधि) स्वामी होकर हे राजन् ! वर्त्तमान हो (मा-अप च्योष्ठाः) तू  राजपद से च्युत नहीं होगा (पर्वतः-इव) पर्वत के समान (अविचाचलिः) अत्यन्त अविचलित हो (इन्द्रः-इव) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर के समान (इह ध्रुवः तिष्ठ) यहाँ-इस राष्ट्र में स्थिर रह (इह राष्ट्रम्-उ धारय) इस राजसूययज्ञ के अवसर पर प्रजाजनों के समक्ष राष्ट्र को धारण कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा को चाहिये कि वह राष्ट्र को दृढ़ता से सँभाले, पर्वत के समान दृढ़ अविचलित रहे, प्रजा का कल्याण सिद्ध करे ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मर्यादा-पालक' राजा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे राजन् ! (इह एव एधि) = तू यहाँ राज्यसिंहासन पर ही हो। (मा अपच्योष्ठाः) = इस आसन से तू च्युत न हो। अन्याय्य दण्ड आदि के कारण प्रजा के असन्तोष से तुझे इस सिंहासन को छोड़ना न पड़े। इसीलिए तूने (पर्वतः इव) = पर्वत की तरह (अविचाचलिः) = अपने राजधर्म में स्थिर रहनेवाला होना । [२] (इन्द्रः इव) = जैसे प्रभु संसार के शासक हैं, उसी प्रकार तूने भी [ इन्द्रः ] जितेन्द्रिय बनकर (इह) = इस शासन कार्य में (ध्रुवः तिष्ठ) = ध्रुव होकर स्थित होना, मर्यादा का कभी उल्लंघन करनेवाला न बनना। इस प्रकार मर्यादा में सब को स्थापित करनेवाला होकर (इह) = यहाँ (उ) = निश्चय से (राष्ट्रं धारय) = राष्ट्र का धारण करनेवाला हो। 'राजा चतुरो वर्णान् स्वधर्मे स्थापयेत्'-राजा चारों वर्णों को स्वधर्म में स्थापित करनेवाला हो । वस्तुतः राष्ट्र के समुचित धारण का प्रकार यही है कि सब वर्ण अपना-अपना कार्य समुचितरूपेण कर रहे हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा स्वयं जितेन्द्रिय बनकर [ इन्द्र इव] मर्यादा में चलता हुआ सभी को मर्यादा में स्थापित करे और इस प्रकार राष्ट्र का समुचित धारण करे ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इह-एव-एधि) अस्मिन् राष्ट्रे हि स्वामित्वेन वर्तमानो भव (मा-अपच्योष्ठाः) न त्वं राजपदादपच्युतो भविष्यतीति-आश्वासनम् (पर्वतः-इव-अविचाचलिः) पर्वत इवातिशयेनाविचलो भव-भविष्यति (इन्द्रः-इव-इह ध्रुवः-तिष्ठ) ऐश्वर्यवान् परमेश्वर इवास्मिन् राष्ट्रे ध्रुवः स्थिरो भव (इह राष्ट्रम्-उ धारय) अस्मिन् राजसूयप्रसङ्गे प्रजानां समक्षे राष्ट्रं खलु धारय ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Here only, on this seat, Indra, be firm as a rock, never vascillate. Here as the one supreme, pole star of the nation, stay, rule and sustain the Rashtra, one organismic, self-governing, well governed common wealth, brilliant, glorious.