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वि॒भ्राड्बृ॒हत्सुभृ॑तं वाज॒सात॑मं॒ धर्म॑न्दि॒वो ध॒रुणे॑ स॒त्यमर्पि॑तम् । अ॒मि॒त्र॒हा वृ॑त्र॒हा द॑स्यु॒हन्त॑मं॒ ज्योति॑र्जज्ञे असुर॒हा स॑पत्न॒हा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vibhrāḍ bṛhat subhṛtaṁ vājasātamaṁ dharman divo dharuṇe satyam arpitam | amitrahā vṛtrahā dasyuhantamaṁ jyotir jajñe asurahā sapatnahā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒ऽभ्राट् । बृ॒हत् । सुऽभृ॑तम् । वा॒ज॒ऽसात॑मम् । धर्म॑म् । दि॒वः । ध॒रुणे॑ । स॒त्यम् । अर्पि॑तम् । अ॒मि॒त्र॒ऽहा । वृ॒त्र॒ऽहा । द॒स्यु॒हन्ऽत॑मम् । ज्योतिः॑ । ज॒ज्ञे॒ । अ॒सु॒र॒ऽहा । स॒प॒त्न॒ऽहा ॥ १०.१७०.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:170» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विभ्राट्-ज्योतिः) विशेष प्रकाशमान ज्योति (बृहत् सुभृतम्) महान् उत्तमरूप से रखी हुई (दस्युहन्तमम्) क्षीण करनेवाले का नाशक (सत्यम्) स्थिर (दिवः) द्युलोक के (धर्मन् धरुणे) धारक प्रतिष्ठान में (अर्पितम्) स्वतः समर्पित या ईश्वर के द्वारा समर्पित (वाजसातमम्) अत्यन्त अन्नदेनेवाली-अन्नदाता है (अमित्रहा) शत्रुनाशक (वृत्रहा) मेघनाशक (असुरहा) दुष्टप्राणिनाशक (सपत्नहा) विरोधीगणनाशक (जज्ञे) सूर्य प्रसिद्ध हुआ है ॥२॥
भावार्थभाषाः - आकाश में सूर्य की महज्ज्योति है, जो अन्धकार को नष्ट करती है, द्युलोक के धारक प्रतिष्ठान में वर्त्तमान है, अन्न की उत्पत्ति का हेतु है, वह सूर्य मेघ का नाशक, मनुष्य के शत्रुओं का नाशक, दुष्टों तथा विरोधी गणों का नाशक है, ऐसे सूर्य का सेवन करना चाहिये ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अमित्र, वृत्र, असुर व सपत्नों' का विनाशक

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विभ्राट्) = यह देदीप्यमान जीवनवाला पुरुष (ज्योतिः जज्ञे) = अपने में उस ज्योति का प्रादुर्भाव करता है, जो कि (बृहत्) = वृद्धि का कारण बनती है, (सुभृतं) = [शोभनं भृतं यस्मात्] जिसके कारण हमारा उत्तम भरण होता है, (वाजसातमम्) = जो अधिक से अधिक शक्ति को देनेवाली है। जो ज्योति (सत्यम्) = सत्य है और (दिवः धर्मन्) = ज्ञान के धारक (धरुणे) = सर्वाधार प्रभु में (अर्पितम्) = अर्पित हैं, विद्यमान है। इस प्रभु की ज्योति को यह विभ्राट् प्राप्त करता है । [२] यह ज्योति उसके लिये (दस्युहन्तमम्) = दास्य वृत्तियों की अधिक से अधिक नाश करनेवाली होती है। इन विनाशक वृत्तियों को नष्ट करके यह पुरुष (अमित्रहा) = हमारे साथ न स्नेह करनेवाली क्रोध आदि की वृत्तियों को नष्ट करनेवाला होता है । (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत कामवासना को विनष्ट करता है । (असुरहा) = [स्वेषु अस्येषु जुह्वति] स्वार्थमयी आसुरी वृत्ति को दूर करता है और (सपत्नहा) = शरीर के पति बनने की कामनावाले रोगों को विनष्ट करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने जीवन में प्रभु की ज्योति को जगायें और क्रोध, काम, स्वार्थ व रोगों को विनष्ट करनेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विभ्राट्-ज्योतिः) विशेषेण प्रकाशमानं ज्योतिः (बृहत्-सुभृतम्) महत् सुधृतम् (दस्युहन्तमम्) उपक्षयकर्त्तुर्नाशकम् (सत्यम्) स्थिरम् (दिवः-धर्मन् धरुणे-अर्पितम्) द्युलोकस्य धारके प्रतिष्ठाने “प्रतिष्ठा वै धरुणम्” [श० ७।४।२।५] अर्पितम् (वाजसातमम्) अन्नदातृतममस्ति (अमित्रहा वृत्रहा-असुरहा सपत्नहा जज्ञे) शत्रुनाशको मेघहन्ता, दुष्टप्राणिनाशकः-विरोधिगणनाशकः सूर्यः प्रसिद्धो जातः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The mighty refulgent sun, destroyer of unfriendly forces, darkness and evil, anti-life elements, adversaries and enemies, rises, bearing the light that is the highest giver of food, energy and growing advancement. Truly vested in the established order of nature in the solar region, blissfully sustained, it is the highest killer of negative and destructive forces prevailing in life and nature.