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वि॒भ्राड्बृ॒हत्पि॑बतु सो॒म्यं मध्वायु॒र्दध॑द्य॒ज्ञप॑ता॒ववि॑ह्रुतम् । वात॑जूतो॒ यो अ॑भि॒रक्ष॑ति॒ त्मना॑ प्र॒जाः पु॑पोष पुरु॒धा वि रा॑जति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vibhrāḍ bṛhat pibatu somyam madhv āyur dadhad yajñapatāv avihrutam | vātajūto yo abhirakṣati tmanā prajāḥ pupoṣa purudhā vi rājati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒ऽभ्राट् । बृ॒हत् । पि॒ब॒तु॒ । सो॒म्यम् । मधु॑ । आयुः॑ । दध॑त् । य॒ज्ञऽप॑तौ । अवि॑ऽहुतम् । वात॑ऽजूतः । यः । अ॒भि॒ऽरक्ष॑ति । त्मना॑ । प्र॒ऽजाः । पु॒पो॒ष॒ । पु॒रु॒धा । वि । रा॒ज॒ति॒ ॥ १०.१७०.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:170» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में सूर्य सब प्राणियों ओषधियों में जीवनसञ्चार करता है, प्रकाश देता है, सब लोकों को प्रकाश देता है, धारण करता है, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (विभ्राट्) विशेषरूप से दीप्यमान सूर्य (बृहत् सोम्यं मधु) महान् सोम्य जीवनरस की (पिबतु) रक्षा करे (यज्ञपतौ) यज्ञ के कर्ता के निमित्त (अविह्रुतम्) अविच्छिन्न-निरन्तर (आयुः) जीवन को (दधत्) धारण करने को (वातजूतः) वायु से प्रेरित (त्मना-अभिरक्षति) स्वात्मा-स्वस्वरूप से संसार की रक्षा करता है (प्रजाः पुपोष) जड़-जङ्गम प्रजाओं को पुष्ट करता है-पोषित करता है (पुरुधा वि राजति) बहुत प्रकार से प्रकाशित होता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सूर्य दीप्यमान पदार्थ है, महान् जीवनरस वनस्पतियों और प्राणियों में देता है, यज्ञ करनेवाले के निमित्त नीरोग आयु को देता है, वातसूत्रसमूहों से प्रेरित हुआ संसार की रक्षा करता है और प्रकाशित होता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु में जीवन का अर्पण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विभ्राट्) = विशेषरूप से चमकनेवाला यह पुरुष (बृहत्) = वृद्धि के कारणभूत (सोम्यं मधु) = सोम सम्बन्धी ओषधियों की सारभूत वस्तु को (पिबतु) = अपने अन्दर ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें। 'सोम' वानस्पतिक भोजन का अन्तिम सार है। शरीर में रस रुधिर आदि के क्रम से सातवें स्थान में इसकी उत्पत्ति होती है । इसीलिए सारभूत वस्तु होने से इसे 'मधु' यह नाम दिया गया है। इसका हमें पान करने का प्रयत्न करना है, यही सब वृद्धियों को मूल है । [२] यह विभ्राट् अपने (अविह्रुतम्) = कुटिलता से रहित (आयुः) = जीवन को यज्ञपतौ यज्ञों के रक्षक प्रभु में (दधत्) = स्थापित करता है। अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ होकर अपने जीवन को बिताता है । [३] (वातजूतः) = प्राणों से प्रेरित हुआ-हुआ (यः) = जो विभ्राट् (त्मना) = स्वयं (अभिरक्षति) = अपना रक्षण करता है, अर्थात् प्राणायाम के द्वारा जो अपनी शक्तियों का रक्षण करता है, वह (प्रजाः पुपोष) = सन्तानों का उत्तम पोषण करता है और (पुरुधा) = अनेक प्रकार से शोभा को प्राप्त करता है । प्राणायाम के द्वारा शक्ति का रक्षण करता हुआ यह उत्तम सन्तानोंवाला बनता है और अपना भी 'शरीर, मन व बुद्धि' के द्वारा विकास करनेवाला बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जीवन को यज्ञमय बनाते हुए इस जीवनयज्ञ को प्रभु में स्थापित करें और उपासना व प्राणायाम शक्ति का रक्षण करते हुए अपने 'शरीर, मन व बुद्धि' का विकास करें।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते सूर्यः सर्वप्राणिषु सर्वासु ह्योषधिषु च जीवनं सम्पादयति प्रकाशं प्रयच्छति सर्वलोकान् प्रकाशयति धारयति चेत्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (विभ्राट्) विशेषेण दीप्यमानः सूर्यः “भ्राजते ज्वलतिकर्मा” [निघ० १।१६] (बृहत् सोम्यं मधु पिबतु) महत् सोम्यं जीवनरसं पातु रक्षतु ‘व्यत्ययेन पिब आदेशः’ (यज्ञपतौ-अविह्रुतम्-आयुः-दधत्) यज्ञपतौ यज्ञस्य कर्त्तरि अविच्छिन्नमायुर्जीवनं धारयन्-धारयितुमित्यर्थः (वातजूतः) वातेन प्रेरितः (त्मना-अभिरक्षति) स्वात्मना स्वस्वरूपेण संसारमभिरक्षति (प्रजाः पुपोष) जडजङ्गमप्रजाः पोषयति (पुरुधा विराजते) बहुधा प्रकाशते तस्य प्रकाशात्मकत्वात् ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the mighty refulgent sun hold, shower, protect and promote the honey sweets of life’s soma nourishment, and bear and bring untainted health and long life for the performer and promoter of yajna, the sun which, energised by Vayu energy of divine nature protects and sustains all forms of life by its very essence, shines and rules life in many ways.