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सर॑स्वतीं॒ यां पि॒तरो॒ हव॑न्ते दक्षि॒णा य॒ज्ञम॑भि॒नक्ष॑माणाः । स॒ह॒स्रा॒र्घमि॒ळो अत्र॑ भा॒गं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धेहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sarasvatīṁ yām pitaro havante dakṣiṇā yajñam abhinakṣamāṇāḥ | sahasrārgham iḻo atra bhāgaṁ rāyas poṣaṁ yajamāneṣu dhehi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सर॑स्वतीम् । याम् । पि॒तरः॑ । हव॑न्ते । द॒क्षि॒णा । य॒ज्ञम् । अ॒भि॒ऽनक्ष॑माणाः । स॒ह॒स्र॒ऽअ॒र्घम् । इ॒ळः । अत्र॑ । भा॒गम् । रा॒यः । पोष॑म् । यज॑मानेषु । धे॒हि॒ ॥ १०.१७.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:17» मन्त्र:9 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पितरः-यज्ञम्-अभिनक्षमाणाः) मनोभाव अध्यात्मयज्ञ को प्राप्त होते हुए (दक्षिण यां सरस्वतीं हवन्ते) आत्मदान-आत्मसमर्पण से जिस स्तुति का आचरण करते हैं (अत्र सहस्रार्घम्-इळः-भागम्) यहाँ वह स्तुति इस जीवन में सहस्रगुणित भजनीय सुख को (रायः पोषम्) धन के पोषक फल को (यजमानेषु धेहि) हम आत्मयाजी मुमुक्षुओं में धारण करा ॥९॥
भावार्थभाषाः - अध्यात्मयज्ञ को मनोभाव जब प्राप्त हो जाते हैं और आत्मसमर्पण परमात्मा के प्रति कर दिया जाता है, तो सहस्रगुणित सुखलाभ पोषण आत्मयाजी मुमुक्षु को मिलता है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आराधना का फल

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र के अनुसार हम उस सरस्वती के साथ समान रथ में आरूढ़ हों (यां सरस्वतीम्) = जिस सरस्वती को (पितरः) = वे रक्षक लोग (हवन्ते) = पुकारते हैं जो (दक्षिणा:) = कर्मों में दक्ष व कुशल हैं, कुशलता के साथ कर्मों को करते हैं तथा (यज्ञम् अभिनक्षमाणाः) = सदा यज्ञों का व्यापन करते हैं । [२] कर्मों में कुशल व यज्ञशील पितर जिस सरस्वती की आराधना करते हैं वह सरस्वती (अत्र) = इस जीवन में (सहस्रार्घम्) = अनन्त मूल्य वाले अर्थात् जीवन के लिये अत्यन्त उपयोगी (इडः भागम्) = वेदवाणी के भाग को (धेहि) = स्थापित करे तथा (यजमानेषु) = सरस्वती का सदा उपासन करनेवाले यज्ञशील पुरुषों में (रायस्पोषम्) = धन के पोषण को स्थापित करे । सरस्वती की आराधना से अमूल्य ज्ञाननिधि की प्राप्ति तो होती ही है, जीवन के लिये आवश्यक धनों का भी लाभ होता है। एवं सरस्वती की कृपा से श्रेय व प्रेय दोनों का साधन होता है, परलोक व इहलोक दोनों ही ठीक होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सरस्वती की आराधना से हमें अमूल्य ज्ञान तथा धन दोनों की प्राप्ति हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पितरः यज्ञम्-अभिनक्षमाणाः) मनः-मनोभावा अध्यात्मयज्ञ-मभ्याप्नुवन्तः ‘नक्षति व्याप्तिकर्मा” [निघ०२।१८] (दक्षिणा यां सरस्वतीं हवन्ते) आत्मदानेन-आत्मसमर्पणेन “सुपां सुलुक्……” [अष्टा०७।१।३९] इति तृतीयाया लुक्, यां स्तुतिमाचरन्ति (अत्र-सहस्रार्घम्-इळः-भागम्) सा स्तुतिः-अस्मिन् जीवने स्तुत्यस्य भोगस्य “इळः-ईडेः स्तुतिकर्मणः” [निरु०८।८] सहस्रगुणितं भजनीयं सुखम् (रायः पोषम्) धनस्य पोषकं फलम् (यजमानेषु धेहि) अस्मासु-आत्मयाजिषु धारय-स्थापय ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divine Sarasvati, whom venerable sages dedicated to meditative yajna in mind and soul invoke and serve in right earnest, we pray, bless the yajamanas with their share here of food and nourishment, wealth, honour and excellence, and the vision and voice of divinity loved and sought for by thousands of seekers.