पदार्थान्वयभाषाः - [१] (प्रजापतिः) = सब प्रजाओं का रक्षक प्रभु (मह्यम्) = मेरे लिये (एताः) = इन गौवों को (रराण:) = देता है । इन गौवों के द्वारा (विश्वैः देवैः) = सब देवों से तथा (पितृभिः) = पितरों से (संविदानः) = [विद् लाभे] हमें सम्यक् युक्त करता है। अर्थात् इन गोदुग्धों के सेवन से हमारे अन्दर देववृत्ति व पितृवृत्ति का उदय होता है, हम प्रायेण ज्ञान-प्रधान जीवन बिताते हैं और रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त होते हैं । [२] इन (शिवाः सतीः) = कल्याणकर होती हुई गौवों को (न:) = हमारे (गोष्ठं उप आकः) = गोष्ठ में प्राप्त कराइये। (वयम्) = हम (तासाम्) = उन गौवों के (प्रजया) = प्रजाओं के साथ (सं सदेम) = सम्यक्तया अपने घरों में विराजमान हों। इन गौवों से हमारा घर नीरोगता, निर्मलता व तीव्र बुद्धि को प्राप्त करता हुआ चमक उठे। हमारा जीवन अधिकाधिक सुन्दर बने ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गोदुग्ध के सेवन से देववृत्ति व पितृवृत्ति का उदय होता है। घर सब तरह से उत्तम बनता है । सम्पूर्ण सूक्त गोदुग्ध के सेवन के महत्त्व को व्यक्त कर रहा है। इस गोदुग्ध का सेवन हमारे जीवन को दीप्त बनाता है, सूर्य की तरह हम चमकते हैं। यह सूर्य की तरह चमकनेवाला 'विभ्राट् सौर्य:' अगले सूक्त का ऋषि है। इसके लिये प्रभु निर्देश करते हैं-