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सोम॑स्य॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णि॒ बृह॒स्पते॒रनु॑मत्या उ॒ शर्म॑णि । तवा॒हम॒द्य म॑घव॒न्नुप॑स्तुतौ॒ धात॒र्विधा॑तः क॒लशाँ॑ अभक्षयम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somasya rājño varuṇasya dharmaṇi bṛhaspater anumatyā u śarmaṇi | tavāham adya maghavann upastutau dhātar vidhātaḥ kalaśām̐ abhakṣayam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोम॑स्य । राज्ञः॑ । वरु॑णस्य । धर्म॑णि । बृह॒स्पतेः॑ । अनु॑ऽमत्याः । ऊँ॒ इति॑ । शर्म॑णि । तव॑ । अ॒हम् । अ॒द्य । म॒घ॒ऽव॒न् । उप॑ऽस्तुतौ । धातः॑ । विऽधा॑त॒रिति॒ विऽधा॑तः । क॒लशा॑न् । अ॒भ॒क्ष॒य॒म् ॥ १०.१६७.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:167» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् राजन् ! (धातः) राष्ट्र के धारण करनेवाले ! (विधातः) राष्ट्र के चलानेवाले ! (अहम्-अद्य) मैं सम्प्रति (तव सोमस्य राज्ञः) तुझ सोम गुणवाले राजा की (उपस्तुतौ) राजसूययज्ञ में प्रशंसा पद पर (वरुणस्य) तुझ वरनेवाले जनगण के (धर्मणि) धारण-निर्धारण-निर्वाचन में (बृहस्पतेः) घोषित करनेवाले पुरोहित के तथा (अनुमत्याः) अनुमोदन करनेवाली सभा के (उ शर्मणि) सदन में-सभाभवन में (कलशान्-अभक्षयम्) कलाविभागों, गणविभागों या वर्णविभागों को भेदरहितता से-भोगों का भागी बनाता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - युवराज जब राजसूययज्ञ द्वारा अभिषिक्त किया जावे और राष्ट्र का धारण करनेवाला चलानेवाला बने, तो उसके इस प्रशंसापद पर जनप्रतिनिधिगण द्वारा निर्वाचन तथा राजसभा द्वारा अनुमोदन हो जाने के पश्चात् प्रजा के गणों या वर्णों को भेदभाव के बिना राष्ट्र के सुखभोगों का समान अधिकार होना चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कलश-भक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में आहार से उत्पन्न होनेवाली अन्तिम धातु वीर्य है। इसी में शरीरस्थ सब कलाओं का निवास है । 'कलाः शेरते ऽस्मिन्' इस व्युत्पत्ति से इस वीर्य को 'कलश' कहा गया है। इन (कलशान्) = वीर्यकणों का (अभक्षयम्) = मैं भक्षण करता हूँ, इन्हें अपने शरीर में ही सुरक्षित करने का प्रयत्न करता हूँ। [२] इस वीर्य को मैं कब धारण करता हूँ ? [क] जब कि (सोमस्य राज्ञः वरुणस्य धर्मणि) = सोम राजा के व वरुण के धर्म में चलता हूँ। उदीची [उत्तर] दिक् का अधिपति 'सोम' है। इस सोमरक्षण का कर्म 'विनीतता' है। विनीतता के कारण ही इसकी उन्नति बनी रहती है। वरुण का धर्म प्रत्याहार है, यह 'प्रतीची' दिक् का अधिपति है । प्रत्याहार से, इन्द्रियों को विषयों से, प्रत्याहृत करने से मनुष्य पाप से बचा रहता है। एवं 'विनीतता व प्रत्याहार' वीर्यरक्षण के प्रथम साधन हैं। [ख] (उ) = और (बृहस्पतेः) = बृहस्पति के और (अनुमत्याः) = अनुमति के (शर्मणि) = शरण में मैं वीर्यरक्षण करनेवाला बनता हूँ । 'बृहस्पति' ऊर्ध्वा दिक् का अधिपति है । सर्वोत्कृष्ट ज्ञान शिखर पर यह पहुँचनेवाला है। ज्ञान - शिखर पर पहुँचने में लगा हुआ मैं सोम का रक्षण कर पाता हूँ । अनुकूल मति भी सोमरक्षण में सहायक होती है, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध आदि के भाव वीर्यरक्षण के अनुकूल नहीं है । [३] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् ! (विधातः) = सब सृष्टि का निर्माण करनेवाले व (धातः) = धारण करनेवाले प्रभो ! (अहम्) = मैं (अद्य) = आज (तव) = तेरी (उपस्तुतौ) = स्तुति में व उपासना में इन वीर्यकणों का रक्षण करता हूँ । प्रभु का स्मरण मुझे वासनाओं से बचाता है और वीर्यरक्षण के योग्य बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वीर्यरक्षण के साधन ये हैं- [क] विनीत बनना, [ख] पापवृत्ति से दूर होना, इन्द्रियों को विषयों में जाने से रोकना, [ग] ऊँचे से ऊँचे ज्ञान की प्राप्ति में लगे रहना, [घ] ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध में न फँसना, [ङ] प्रभु का स्मरण [निर्माण व धारण के कर्मों में लगे रहना]।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे ऐश्वर्यवन् राजन् ! (धातः) राष्ट्रस्य धारयितः ! (विधातः) राष्ट्रस्य चालयितः (अहम्-अद्य) अहं सम्प्रति (तव सोमस्य राज्ञः) तव सोम्यस्य-सोमगुणवतो राज्ञः (उपस्तुतौ) प्रशंसापदे राजसूये (वरुणस्य) त्वां वरयितुर्जनगणस्य (धर्मणि) धारणे (बृहस्पतेः) अनुमत्याः ( उ शर्मणि) घोषयितुः पुरोहितस्य तथानुमतिदात्र्याः सभायाः खलु सदने (कलशान्-अभक्षयम्) कलाविभागाः समस्तप्रजाजनानां विभागाः-खल्वभेदेन येषु सन्ति तथाभूतान् भोगान् भोजयामि प्रयच्छामि राजसूये ब्रह्मा वदति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Maghavan, lord of power and glory, Dhata, ruler, Vidhata, controller of the state and its administration, this day I invite you to the holy investiture and to take over the various departments and institutions of the state in the ruling order of the law of Soma, peace, and Varuna, justice, in the house of Brhaspati, supreme presiding power, and Anumati, will of the nation.