पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में आहार से उत्पन्न होनेवाली अन्तिम धातु वीर्य है। इसी में शरीरस्थ सब कलाओं का निवास है । 'कलाः शेरते ऽस्मिन्' इस व्युत्पत्ति से इस वीर्य को 'कलश' कहा गया है। इन (कलशान्) = वीर्यकणों का (अभक्षयम्) = मैं भक्षण करता हूँ, इन्हें अपने शरीर में ही सुरक्षित करने का प्रयत्न करता हूँ। [२] इस वीर्य को मैं कब धारण करता हूँ ? [क] जब कि (सोमस्य राज्ञः वरुणस्य धर्मणि) = सोम राजा के व वरुण के धर्म में चलता हूँ। उदीची [उत्तर] दिक् का अधिपति 'सोम' है। इस सोमरक्षण का कर्म 'विनीतता' है। विनीतता के कारण ही इसकी उन्नति बनी रहती है। वरुण का धर्म प्रत्याहार है, यह 'प्रतीची' दिक् का अधिपति है । प्रत्याहार से, इन्द्रियों को विषयों से, प्रत्याहृत करने से मनुष्य पाप से बचा रहता है। एवं 'विनीतता व प्रत्याहार' वीर्यरक्षण के प्रथम साधन हैं। [ख] (उ) = और (बृहस्पतेः) = बृहस्पति के और (अनुमत्याः) = अनुमति के (शर्मणि) = शरण में मैं वीर्यरक्षण करनेवाला बनता हूँ । 'बृहस्पति' ऊर्ध्वा दिक् का अधिपति है । सर्वोत्कृष्ट ज्ञान शिखर पर यह पहुँचनेवाला है। ज्ञान - शिखर पर पहुँचने में लगा हुआ मैं सोम का रक्षण कर पाता हूँ । अनुकूल मति भी सोमरक्षण में सहायक होती है, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध आदि के भाव वीर्यरक्षण के अनुकूल नहीं है । [३] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् ! (विधातः) = सब सृष्टि का निर्माण करनेवाले व (धातः) = धारण करनेवाले प्रभो ! (अहम्) = मैं (अद्य) = आज (तव) = तेरी (उपस्तुतौ) = स्तुति में व उपासना में इन वीर्यकणों का रक्षण करता हूँ । प्रभु का स्मरण मुझे वासनाओं से बचाता है और वीर्यरक्षण के योग्य बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वीर्यरक्षण के साधन ये हैं- [क] विनीत बनना, [ख] पापवृत्ति से दूर होना, इन्द्रियों को विषयों में जाने से रोकना, [ग] ऊँचे से ऊँचे ज्ञान की प्राप्ति में लगे रहना, [घ] ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध में न फँसना, [ङ] प्रभु का स्मरण [निर्माण व धारण के कर्मों में लगे रहना]।