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अ॒भि॒भूर॒हमाग॑मं वि॒श्वक॑र्मेण॒ धाम्ना॑ । आ व॑श्चि॒त्तमा वो॑ व्र॒तमा वो॒ऽहं समि॑तिं ददे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhibhūr aham āgamaṁ viśvakarmeṇa dhāmnā | ā vaś cittam ā vo vratam ā vo haṁ samitiṁ dade ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि॒ऽभूः । अ॒हम् । आ । अ॒ग॒म॒म् । वि॒श्वऽक॑र्मेण । धाम्ना॑ । आ । वः॒ । चि॒त्तम् । आ । वः॒ । व्र॒तम् । आ । वः॒ । अ॒हम् । सम्ऽइ॑तिम् । द॒दे॒ ॥ १०.१६६.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:166» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं (अभिभूः) शत्रुओं का दबानेवाला (विश्वकर्मेण) सब कर्म जिससे किये जाते हैं, वैसे (धाम्ना) अङ्ग से-अङ्गबल से (आगमम्) आक्रमण करता हूँ (वः) तुम्हारे (चित्तम्) चित्त को (अहम्) मैं (आददे) स्वाधीन करता हूँ (वः-व्रतम्-आ) तुम्हारे कर्म को स्वाधीन करता हूँ (वः-समितिम्-आ०) तुम्हारी सभा या संग्राम को स्वाधीन करता हूँ ॥४॥
भावार्थभाषाः - राजा के अन्दर शत्रुओं को दबाने का आत्मबल और युद्ध करने को अङ्गों का बल होना चाहिये तथा शत्रुओं के मनों को स्वाधीन करने का मनोबल और उनके कर्म को और समिति को स्वाधीन करने के लिए शस्त्रबल होना चाहिए ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभिभूः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं (विश्वकर्मेण धाम्ना) = सब कर्मों को करनेवाले तेज से (अभिभूः) = सब शत्रुओं को अभिभूतवाला बनकर (आगमम्) = आया हूँ। वस्तुतः तेजस्विता से मैं सब शत्रुओं को निस्तेज बनानेवाला हुआ हूँ। [२] यह तेजस्वी पुरुष जब सभा में आता है तो सबके चित्तों को अपनी ओर आकृष्ट करता है। (वः) = तुम्हारे सब सभ्यों के (चित्तम्) = चित्त को (आददे) = अपनी ओर आकृष्ट करता हूँ। इसके बाद (वः) = तुम्हारे (व्रतम्) = कर्मों को (आददे) = ग्रहण करता हूँ, अर्थात् समिति के कार्यों में दिलचस्पी लेने लगता हूँ और अन्ततः (अहम्) = मैं (वः) = आपकी (समितिम्) = इस समिति को (आददे) = ग्रहण करनेवाला होता हूँ । समिति का मुखिया हो जाता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - जितेन्द्रिय पुरुष ही सभाओं का संचालन कर पाता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्-अभिभूः विश्वकर्मेण धाम्ना-आगमम्) अहं शत्रूणामभिभविता-ऽस्मि विश्वानि कर्माणि येन क्रियन्ते तथाभूतेन-अङ्गेनाङ्गबलेन “अङ्गानि वै धामानि” [का० श० ४।३।४।११] आक्रमामि (वः) युष्माकम् (चित्तम्-अहम्-आददे) अहं चित्तं स्वाधीनीकरोमि (वः व्रतम्-आ०) युष्माकं कर्म स्वाधीनीकरोमि (वः समितिम्-आ०) युष्माकं सभां सग्रामं-वा स्वाधीनीकरोमि ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I am the controller and disciplinarian over all, come with the light and power over the entire activity here. I take over, accept and honour your mind and speech, your law, discipline and behaviour, and your assembly under my power and control.