वांछित मन्त्र चुनें

अत्रै॒व वोऽपि॑ नह्याम्यु॒भे आर्त्नी॑ इव॒ ज्यया॑ । वाच॑स्पते॒ नि षे॑धे॒मान्यथा॒ मदध॑रं॒ वदा॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atraiva vo pi nahyāmy ubhe ārtnī iva jyayā | vācas pate ni ṣedhemān yathā mad adharaṁ vadān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अत्र॑ । ए॒व । वः॒ । अपि॑ । न॒ह्या॒मि॒ । उ॒भे इति॑ । आर्त्नी॑ इ॒वेत्यार्त्नी॑ऽइव । ज्यया॑ । वाचः॑ । प॒ते॒ । नि । से॒ध॒ । इ॒मान् । यथा॑ । मत् । अध॑रम् । वदा॑न् ॥ १०.१६६.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:166» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) हे शत्रुओं  ! तुम्हें (अत्र-एव) बन्धनगृह में (अपि नह्यामि) हस्त पाद बन्धनों से बाँधता हूँ (उभे-आर्त्नी-इव ज्यया) दोनों धनुष्कोटियों को जैसे डोरी से बाँधते हैं (वाचस्पते) वे वेदवाणी के स्वामी-परमात्मन् ! (इमान्) इन शत्रुओं को (निषेध) रोक (यथा) जैसे (मत्-अधरम्) मेरे से नीचे (वदान्) मेरे अनुकूल बोलें ॥३॥
भावार्थभाषाः - शत्रु जब पकड़ लिये जावें, तो उन्हें बन्दीघर में हाथ पैरों से बाँधकर रखा जावे और फिर उन्हें अपने अनुकूल बनाया जावे ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सपत्न-बन्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जैसे (उभे आर्ली) = धनुष की दोनों कोटियों को (ज्यया) = ज्या [डोरी] से बाँध देते हैं, इसी प्रकार से काम-क्रोध आदि शत्रुओं में (वः) = तुम्हें (अत्र एव) = यहाँ शरीर में ही (अपिनह्यामि) = बाँधनेवाला होता हूँ । काम-क्रोध को पूर्णरूप से वश में कर लें तो ये शत्रु न होकर मित्र हो जाते हैं। इसी को व्यापक शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि वशीभूत मन मित्र है, अवशीभूत मन ही शत्रु है । [२] वाचस्पते हे वाणी के पति ! (इमान् निषेध) = इन शत्रुओं को निषिद्ध कर । वस्तुतः इस जिह्वा को वशीभूत कर लेने से रसास्वाद से ऊपर उठकर मनुष्य नीरोग बनता है और व्यर्थ के शब्दों से ऊपर उठकर लड़ाई-झगड़ों से बचा रहता है। वाचस्पति मेरे शत्रुओं को इस प्रकार दूर करे कि (यथा) = जिससे (मद् अधरम्) = मेरे नीचे होकर ये वदान् बात करें, अर्थात् सदा मेरी अधीनता में रहें। इनकी बात मुख्य न हो, ये मेरी बात को ही कहें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - काम-क्रोध को हम पूर्ण रूप से वश करनेवाले हों ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वः) हे सपत्नाः ! युष्मान् (अत्र-एव) अस्मिन् कोष्ठे हि (अपि नह्यामि) अपि बध्नामि हस्तपादबन्धनाभ्याम् (उभे आर्त्नी-इव ज्यया) यथा चापस्य कोटी कोणौ प्रत्यञ्चया बध्येते (वाचस्पते) हे वाचस्पते परमात्मन् ! (इमान् निषेध) इमान् सपत्नान्-अवरोधय (यथा मत्-अधरं वदान्) यथा मत्तौ नीचैर्ममानुकूलं वचनं वदेयुः “लेट्-प्रयोगः” ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Here itself, both of you, rival parties, I bind and hold you together in balance like the bow string holding both ends of the bow in tension. O Vachaspati, speaker and master of the Word of order and law of judgement, control these so that they speak under my discipline and control.