पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जैसे (उभे आर्ली) = धनुष की दोनों कोटियों को (ज्यया) = ज्या [डोरी] से बाँध देते हैं, इसी प्रकार से काम-क्रोध आदि शत्रुओं में (वः) = तुम्हें (अत्र एव) = यहाँ शरीर में ही (अपिनह्यामि) = बाँधनेवाला होता हूँ । काम-क्रोध को पूर्णरूप से वश में कर लें तो ये शत्रु न होकर मित्र हो जाते हैं। इसी को व्यापक शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि वशीभूत मन मित्र है, अवशीभूत मन ही शत्रु है । [२] वाचस्पते हे वाणी के पति ! (इमान् निषेध) = इन शत्रुओं को निषिद्ध कर । वस्तुतः इस जिह्वा को वशीभूत कर लेने से रसास्वाद से ऊपर उठकर मनुष्य नीरोग बनता है और व्यर्थ के शब्दों से ऊपर उठकर लड़ाई-झगड़ों से बचा रहता है। वाचस्पति मेरे शत्रुओं को इस प्रकार दूर करे कि (यथा) = जिससे (मद् अधरम्) = मेरे नीचे होकर ये वदान् बात करें, अर्थात् सदा मेरी अधीनता में रहें। इनकी बात मुख्य न हो, ये मेरी बात को ही कहें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - काम-क्रोध को हम पूर्ण रूप से वश करनेवाले हों ।