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हे॒तिः प॒क्षिणी॒ न द॑भात्य॒स्माना॒ष्ट्र्यां प॒दं कृ॑णुते अग्नि॒धाने॑ । शं नो॒ गोभ्य॑श्च॒ पुरु॑षेभ्यश्चास्तु॒ मा नो॑ हिंसीदि॒ह दे॑वाः क॒पोत॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hetiḥ pakṣiṇī na dabhāty asmān āṣṭryām padaṁ kṛṇute agnidhāne | śaṁ no gobhyaś ca puruṣebhyaś cāstu mā no hiṁsīd iha devāḥ kapotaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हे॒तिः । प॒क्षिणी॑ । न । द॒भा॒ति॒ । अ॒स्मान् । आ॒ष्ट्र्याम् । प॒दम् । कृ॒णु॒ते॒ । अ॒ग्नि॒ऽधाने॑ । शम् । नः॒ । गोभ्यः॑ । च॒ । पुरु॑षेभ्यः । च॒ । अ॒स्तु॒ । मा । नः॒ । हिं॒सी॒त् । इ॒ह । दे॒वाः॒ । क॒पोतः॑ ॥ १०.१६५.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:165» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:23» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विजय के इच्छुक विद्वानों (पक्षिणी हेतिः) पर पक्षवाली प्रहार करनेवाली सेना (अस्मान्) हमें (न दभाति) नहीं हिंसित करती है (आष्ट्र्याम्-अग्निधाने) अशनशाला-भोजनशाला में खाने को तथा अग्निस्थान यज्ञकुण्ड में होमने को (पदं कृणुते) स्वपद-सहयोग पद स्थापित करता है, इस प्रकार मैत्री मित्रता को बनाता है, अतः (नः) हमारे (पुरुषेभ्यः) मनुष्यों के लिए (च) और (गोभ्यः-च शम्-अस्तु) और गौओं के लिए कल्याण होवे-है (कपोतः मा नः हिंसीत्) दूत हमें नहीं हिंसित करेगा ॥३॥
भावार्थभाषाः - परराष्ट्र का दूत अपनी भोजनशाला में साथ भोजन करके और होम यज्ञ में साथ यज्ञ करके मैत्री करने के लिए या मित्रता करने के लिए इस प्रकार सहयोग करता है और उसका सहयोग प्राप्त हो जाता है, तब परराष्ट्र की सेना द्वारा प्रहार का भय नहीं रहता, इसलिए दूत के साथ स्वागतपूर्वक अच्छा व्यवहार करना चाहिए ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अति' से बचना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पक्षिणी हेतिः) = किसी एक पक्ष में चले जानेरूप नाशक (अस्त्र अस्मान्) = हमें (न दभाति) = हिंसित नहीं करता। किसी भी अति [extreme ] में न पड़कर हम सदा मध्यमार्ग में चलते हैं और इस प्रकार अपने जीवन में हिंसित नहीं होते। अति ही हमारे रोग आदि का कारण बनती है । यह अति से बचनेवाला पुरुष (आष्ट्याम्) = [अशू व्याप्तौ ] व्यापक मनोवृत्ति में तथा अग्निधाने यज्ञों के लिये अग्नि के स्थापित करने आदि कार्यों में (पदं कृणुते) = गति को करता है, अर्थात् मनोवृत्ति को व्यापक बनाता है और यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होता है । [२] इस प्रकार [क] मध्यमार्ग में चलने, [ख] मनोवृत्ति को व्यापक बनाने [ग] तथा यज्ञों के करने पर (नः) = हमारे (गोभ्यः) = गवादि पशुओं के लिये (च) = और (पुरुषेभ्यः) = पुरुषों के लिये (शं अस्तु) = शान्ति हो । वस्तुतः हमारे कर्मों के उत्तम होने पर आधिदैविक आपत्तियों का भी निवारण हो जाता है, सारा वातावरण उत्तम बन जाता है । (देवाः) = हे देवो ! (इह) = इस जीवन में (कपोतः) = यह ब्रह्मनिष्ठ व्यक्ति (नः) = हमें (मा हिंसीत्) = मत हिंसित करे। अपने सदुपदेशों से हमारा कल्याण ही करनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम अति में न आयें । मनोवृत्ति को व्यापक बनायें। अग्निहोत्रादि यज्ञों को करें । इस प्रकार हमारे पशुओं व मनुष्यों के लिये शान्ति हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे जिगीषवो विद्वांसः (पक्षिणी-हेतिः-अस्मान् न दभाति) परपक्षिणी प्रहर्त्री सेनाऽस्मान् न हिनस्ति ( आष्ट्र्याम्-अग्निधाने पदं कृणुते) यतोऽयं दूतोऽश्नाति भुञ्जते यस्यां तस्यां भोजनशालायां भोक्तुं तथाऽग्निधाने यज्ञकुण्डे च स्वपदं सहयोगपदं करोति स्थापयति, एवं मैत्रीं भावयति, अतः (नः-गोभ्यः च पुरुषेभ्यः-च शम्-अस्तु) अस्माकं गोभ्यो गवादिपशुभ्यस्तथा पुरुषेभ्यश्च कल्याणं भवेत् (कपोतः-मा नः-हिंसीत्) दूतोऽस्मान् न हिंसीत् हिंसिष्यति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let not the winged force of the messenger attack, destroy or deceive us. Let it create a place for itself in our space and in the yajnic hall. Let there be peace for our lands, cows and culture and for our people. O leading lights, this messenger must not hurt us here.