पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शिवः) = [श्यति पापम्, अथवा शिवु कल्याणे] अपने उपदेशों के द्वारा पापवृत्तियों को विनष्ट करनेवाला व कल्याण करनेवाला, (कपोतः) = ब्रह्मरूप पोतवाला ब्रह्मनिष्ठ, (इषित:) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त हुआ हुआ (नः) = हमारे लिये (अनागाः) = निष्पाप अस्तु हो । हमारे जीवनों को यह निष्पाप बनानेवाला हो। हे (देवाः) = देवो ! इस प्रकार यह (गृहेषु) = हमारे घरों में (शकुनः) = शक्ति का संचार करनेवाला हो । [२] यह (अग्निः) = हमें उन्नतिपथ पर ले चलनेवाला (विप्र:) = ज्ञानी ब्राह्मण (हि) = निश्चय से (नः हविः) = हमारे से दी गई हवि को, पत्र-पुष्प फल तोथ के रूप में दी गई तुच्छ भेंट को (जुषताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करे । इस अग्नि के उपदेशों से (पक्षिणी हेतिः) = किसी एक पक्ष में चले जानेरूप नाशक अस्त्र (नः) = हमें (परिवृणक्तु) = छोड़ दे। हम किसी पक्ष में न गिरें, पक्षपात रहित न्यायाचरण से अपने कल्याण को सिद्ध करें । ' avoid extremes' 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' का ध्यान करते हुए युक्ताहार-विहारवाले बनें । तथा समाज में भी किसी पक्ष के साथ न जुड़ जायें, पार्टीवाजी में न पड़ जायें। सामाजिक उन्नति में सब से महान् विघ्न यही होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ब्रह्मनिष्ठ पुरुषों का उपदेश हमें निष्पाप व शक्तिशाली बनाये। इनके उपदेशों से हम अति से व पार्टीवाजी से बचे रहें।