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शि॒वः क॒पोत॑ इषि॒तो नो॑ अस्त्वना॒गा दे॑वाः शकु॒नो गृ॒हेषु॑ । अ॒ग्निर्हि विप्रो॑ जु॒षतां॑ ह॒विर्न॒: परि॑ हे॒तिः प॒क्षिणी॑ नो वृणक्तु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śivaḥ kapota iṣito no astv anāgā devāḥ śakuno gṛheṣu | agnir hi vipro juṣatāṁ havir naḥ pari hetiḥ pakṣiṇī no vṛṇaktu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शि॒वः । क॒पोतः॑ । इ॒षि॒तः । नः॒ । अ॒स्तु॒ । अ॒ना॒गाः । दे॒वाः॒ । श॒कु॒नः । गृ॒हेषु॑ । अ॒ग्निः । हि । विप्रः॑ । जु॒षता॑म् । ह॒विः । नः॒ । परि॑ । हे॒तिः । प॒क्षिणी॑ । नः॒ । वृ॒ण॒क्तु॒ ॥ १०.१६५.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:165» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:23» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विजय के इच्छुक विद्वानों ! (इषितः) भेजा हुआ (शिवः) कल्याणकर (कपोतः) वेश भाषा में विचित्र संदेशवाहक (नः-गृहेषु) हमारे गृहदि घरों में-प्रजाजनों में उनके निमित्त (अनागाः) पापरहित (शकुनः) सुभाषण में शक्त-शक्तिमान् (अग्निः) अग्रणी (विप्रः) मेधावी विद्वान् (हविः-जुषताम्) सत्कार भोजन आदि को सेवन करे (पक्षिणी हेतिः) परपक्षीया प्रहार करनेवाली सेना (नः परि वृणक्तु) हमें छोड़ दे ॥२॥
भावार्थभाषाः - आये हुए दूत का सत्कार भोजनादि से करना चाहिए, यह हमारे पास आता है। परपक्ष की प्रहारक सेना अपने प्रहार हमारे ऊपर न छोड़े ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निष्पापता व शक्ति संचार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शिवः) = [श्यति पापम्, अथवा शिवु कल्याणे] अपने उपदेशों के द्वारा पापवृत्तियों को विनष्ट करनेवाला व कल्याण करनेवाला, (कपोतः) = ब्रह्मरूप पोतवाला ब्रह्मनिष्ठ, (इषित:) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त हुआ हुआ (नः) = हमारे लिये (अनागाः) = निष्पाप अस्तु हो । हमारे जीवनों को यह निष्पाप बनानेवाला हो। हे (देवाः) = देवो ! इस प्रकार यह (गृहेषु) = हमारे घरों में (शकुनः) = शक्ति का संचार करनेवाला हो । [२] यह (अग्निः) = हमें उन्नतिपथ पर ले चलनेवाला (विप्र:) = ज्ञानी ब्राह्मण (हि) = निश्चय से (नः हविः) = हमारे से दी गई हवि को, पत्र-पुष्प फल तोथ के रूप में दी गई तुच्छ भेंट को (जुषताम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करे । इस अग्नि के उपदेशों से (पक्षिणी हेतिः) = किसी एक पक्ष में चले जानेरूप नाशक अस्त्र (नः) = हमें (परिवृणक्तु) = छोड़ दे। हम किसी पक्ष में न गिरें, पक्षपात रहित न्यायाचरण से अपने कल्याण को सिद्ध करें । ' avoid extremes' 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' का ध्यान करते हुए युक्ताहार-विहारवाले बनें । तथा समाज में भी किसी पक्ष के साथ न जुड़ जायें, पार्टीवाजी में न पड़ जायें। सामाजिक उन्नति में सब से महान् विघ्न यही होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ब्रह्मनिष्ठ पुरुषों का उपदेश हमें निष्पाप व शक्तिशाली बनाये। इनके उपदेशों से हम अति से व पार्टीवाजी से बचे रहें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) जिगीषवो विद्वांसः (इषितः शिवः कपोतः) प्रेषितः कल्याणकरः वेशभाषाभिर्विचित्रः सन्देशवाहकः (नः-गृहेषु) अस्माकं गृहवासिषु प्रजाजनेषु तन्निमित्तमित्यर्थः (अनागाः-शकुनः-अस्तु) पापरहितः सुभाषणे शक्तो भवतु “शकुनः शक्तिमान्” [यजु० १८।५३ दयानन्दः] (अग्निः विप्रः) अग्रणी मेधावी विद्वान् (हविः-जुषताम्) सत्कारं भोजनादिकं सेवताम् (पक्षिणी हेतिः) परपक्षीया प्रहारकर्त्री सेना (नः-परिवृणक्तु) अस्मान् परित्यजतु-संग्रामं न करोतु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May this bird sent from the land of destiny be good and auspicious for us. May the bird and its message be free from blame and violence in and for our homes. Let this vibrant messenger accept and enjoy our hospitality offered with faith and let there be no strike of the winged force of arms to disturb and uproot us from our settled land.