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यदा॒शसा॑ नि॒:शसा॑भि॒शसो॑पारि॒म जाग्र॑तो॒ यत्स्व॒पन्त॑: । अ॒ग्निर्विश्वा॒न्यप॑ दुष्कृ॒तान्यजु॑ष्टान्या॒रे अ॒स्मद्द॑धातु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad āśasā niḥśasābhiśasopārima jāgrato yat svapantaḥ | agnir viśvāny apa duṣkṛtāny ajuṣṭāny āre asmad dadhātu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । आ॒ऽशसा॑ । निः॒ऽशसा॑ । अ॒भि॒ऽशसा॑ । उ॒प॒ऽआ॒रि॒म । जाग्र॑तः । यत् । स्व॒पन्तः॑ । अ॒ग्निः । विश्वा॑नि । अप॑ । दुः॒ऽकृ॒तानि॑ । अजु॑ष्टानि । आ॒रे । अ॒स्मत् । दा॒धा॒तु॒ ॥ १०.१६४.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:164» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:22» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जो मानसिक दुष्कर्म (आशसा) आकाङ्क्षा से-इच्छा से (निः शसा) बिना आकाङ्क्षा-अनिच्छा से (अभिशसा) अभिगत काङ्क्षा वासना से (जाग्रतः) जागते हुए (यत्) जिसे वो (स्वपन्तः) सोते हुए (उपारिम) उपगत हो-प्राप्त हो (अग्निः) ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा (विश्वानि दुष्कृतानि-अजुष्टानि) मानसिक पाप फल सेवन से प्रथम ही (अस्मत्) हमारे से (आरे) दूर (अप दधातु) फेंक दे-नष्ट कर दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की स्तुति उपासना करने से जो मानसिक पाप कर्म में न आए हुए केवल मन में ही हैं, वे इच्छापूर्वक हों या अनिच्छा से या पूर्व की वासना से प्रथम ही नष्ट हो जाया करते हैं, अतः शिवसंकल्प के साथ परमात्मा की स्तुति उपासना करनी चाहिए ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पापों से दूर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जो (आशसा) = किसी अभिलाषा से अथवा (निःशसा) = बिना अभिलाषा के अनिच्छा से (अभिशसा) = [अभिशंस् = to praise, lxtol] झूठी प्रशंसा को प्राप्त करने के लिये (उपारिम) = गलती कर जाते हैं। (जाग्रत:) = जागते हुए हम जो गलती कर जाते हैं, (या यत्) = जो (स्वपन्तः) = सोते हुए हम गलती करते हैं [स्वप्न में किसी के लिये बुरा चिन्तन आदि स्वप्न के पाप हैं], (अग्निः) = परमात्मा उन (विश्वानि) = सब (अजुष्टानि) = आर्यपुरुषों से असेवित (दुष्कृतानि) = पापों को (अस्मत्) = हमारे (आरे) = दूर (अपधातु) = स्थापित करे । प्रभु कृपा से हम सब असेवनीय पापों से दूर हों । [२] धन आदि भौतिक वस्तुओं की कामना से होनेवाले पापों के लिये 'आशसा' शब्द का प्रयोग है। न चाहते हुए किसी दबाव से हो जानेवाले पापों के लिये 'निःशसा' शब्द है तथा झूठे यश की [वाहवाही की] कामना से होनेवाले पापों के लिये 'अभिशसा' शब्द आया है। प्रभु हमें इन सब पापों से बचायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम धन की इच्छा से दबाव में पड़कर या वाहवाही की खातिर पापों को न कर बैठे।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) यद् दुष्कर्म मानसम् (आशसा) आकाङ्क्षया (निः शसा) निः काङ्क्षया (अभि शसा) अभिगतकाङ्क्षया-वासनया (जाग्रतः) जाग्रतः सन्तः (यत्) यच्च (स्वपन्तः) स्वप्नं गृह्णन्तः (उपारिम) उपगच्छेम-प्राप्नुम (अग्निः) ज्ञानप्रकाशस्वरूपः परमात्मा (विश्वानि दुष्कृतानि-अजुष्टानि) सर्वाणि मानसिपापानि फलसेवनात् पूर्वाणि (अस्मत्) अस्मत्तः (आरे) दूरम् (अपदधातु) क्षिपतु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whatever ill and undesirable we might have committed either in hope and expectation, or for fear and despair, or hate and calumny, while sleeping, dreaming or awake, may Agni, lord of light, giver of enlightenment, cast off all those alien evils and undesirables far away from us (leaving us only with the good and auspicious).