पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (रेवान्) = धनवान् होता हुआ (अस्मै) = इस प्रभु प्राप्ति के लिये (सोमं न सुनोति) = सोम का अभिषव नहीं करता, सोम का सम्पादन न करता हुआ जो विलासमय जीवन को बिताता हुआ सोम का [वीर्य का] विनाश करता है, (एषः) = यह व्यक्ति (अस्य) = इस प्रभु की (अनुस्पष्टः भवति) = दृष्टि में स्थापित होता है । [स्पश = to see ] प्रभु की इस पर नजर होती है । उसी प्रकार जैसे कि एक अशुभ आचरणवाला व्यक्ति राजपुरुषों की नजरों में होता है । [२] यदि यह अधिक विलास में चलता है, तो (तम्) = उस विलासमय जीवनवाले धनी पुरुष को (मघवा) = यह ऐश्वर्यशाली प्रभु (अरत्नौ) = मुट्ठी में (निः दधाति) = निश्चय से धारण करता है, अर्थात् उसे कैद-सी में डालता है । और भी अधिक विकृति के होने पर इन (ब्रह्मद्विषः) = वेद के शत्रुओं को, ज्ञान से विपरीत मार्ग पर चलनेवालों को वे प्रभु (हन्ति) = विनष्ट करते हैं। (अनानुदिष्ट:) = ये प्रभु कभी अनुदिष्ट नहीं हो पाते। प्रभु तक कोई सिफारिश नहीं पहुँचाई जा सकती। [३] धन के कारण विलासमय जीवनवाला व्यक्ति इस प्रकार प्रभु से 'अनुस्पष्ट, धृत व दण्डित' होता है । हमें चाहिये यह कि हम विलास के मार्ग पर न जाकर तप के मार्ग पर ही चलें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विलासी पुरुष प्रभु के दण्ड का पात्र होता है ।
अन्य संदर्भ: सूचना - यहाँ दण्डक्रम बड़ा स्पष्ट है। प्रभु सर्वप्रथम चेतावनी - सी देते हैं, पुनः किसी प्रकार रोगादि के द्वारा उसे बद्ध कर देते हैं। विवशता में समाप्त कर देते हैं । मृत्यु भी अशुभ वृत्ति के भुलाने में सहायक होती है।