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अनु॑स्पष्टो भवत्ये॒षो अ॑स्य॒ यो अ॑स्मै रे॒वान्न सु॒नोति॒ सोम॑म् । निर॑र॒त्नौ म॒घवा॒ तं द॑धाति ब्रह्म॒द्विषो॑ ह॒न्त्यना॑नुदिष्टः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anuspaṣṭo bhavaty eṣo asya yo asmai revān na sunoti somam | nir aratnau maghavā taṁ dadhāti brahmadviṣo hanty anānudiṣṭaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनु॑ऽस्पष्टः । भ॒व॒ति॒ । ए॒षः । अ॒स्य॒ । यः । अ॒स्मै॒ । रे॒वान् । न । सु॒नोति॑ । सोम॑म् । निः । अ॒र॒त्नौ । म॒घऽवा॑ । तम् । द॒धा॒ति॒ । ब्र॒ह्म॒ऽद्विषः॑ । ह॒न्ति॒ । अन॑नुऽदिष्टः ॥ १०.१६०.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:160» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:18» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (रेवान्-न) धनवान् की भाँति (अस्मै) इस राजा के लिए (सोमम्) राष्ट्र को (सुनोति) सम्पन्न करता है-समुन्नत करता है (अस्य) इस मनुष्य का (एषः) यह राजा (अनुस्पष्टः) अनुगृहीत (भवति) होता है (मघवा) धनवान् राजा (तम्-अरत्नौ) उसको अपने रक्षावाले हाथ में (निः-दधाति) निश्चितरूप में धारण करता है (अनानुदिष्टः) बिना कहे ही (ब्रह्मद्विषः) विद्वानों के द्वेष करनेवालों को (हन्ति) मारता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - धनवान् जन राष्ट्र को समुन्नत करता है, तो राजा अपने हाथ में रक्षण लेता है, विद्वानों से द्वेष करनेवाले को नष्ट करना चाहिए ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विलास का परिणाम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (रेवान्) = धनवान् होता हुआ (अस्मै) = इस प्रभु प्राप्ति के लिये (सोमं न सुनोति) = सोम का अभिषव नहीं करता, सोम का सम्पादन न करता हुआ जो विलासमय जीवन को बिताता हुआ सोम का [वीर्य का] विनाश करता है, (एषः) = यह व्यक्ति (अस्य) = इस प्रभु की (अनुस्पष्टः भवति) = दृष्टि में स्थापित होता है । [स्पश = to see ] प्रभु की इस पर नजर होती है । उसी प्रकार जैसे कि एक अशुभ आचरणवाला व्यक्ति राजपुरुषों की नजरों में होता है । [२] यदि यह अधिक विलास में चलता है, तो (तम्) = उस विलासमय जीवनवाले धनी पुरुष को (मघवा) = यह ऐश्वर्यशाली प्रभु (अरत्नौ) = मुट्ठी में (निः दधाति) = निश्चय से धारण करता है, अर्थात् उसे कैद-सी में डालता है । और भी अधिक विकृति के होने पर इन (ब्रह्मद्विषः) = वेद के शत्रुओं को, ज्ञान से विपरीत मार्ग पर चलनेवालों को वे प्रभु (हन्ति) = विनष्ट करते हैं। (अनानुदिष्ट:) = ये प्रभु कभी अनुदिष्ट नहीं हो पाते। प्रभु तक कोई सिफारिश नहीं पहुँचाई जा सकती। [३] धन के कारण विलासमय जीवनवाला व्यक्ति इस प्रकार प्रभु से 'अनुस्पष्ट, धृत व दण्डित' होता है । हमें चाहिये यह कि हम विलास के मार्ग पर न जाकर तप के मार्ग पर ही चलें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - विलासी पुरुष प्रभु के दण्ड का पात्र होता है ।
अन्य संदर्भ: सूचना - यहाँ दण्डक्रम बड़ा स्पष्ट है। प्रभु सर्वप्रथम चेतावनी - सी देते हैं, पुनः किसी प्रकार रोगादि के द्वारा उसे बद्ध कर देते हैं। विवशता में समाप्त कर देते हैं । मृत्यु भी अशुभ वृत्ति के भुलाने में सहायक होती है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः रेवान् न-अस्मै सोमं सुनोति) यो धनवानिवास्मै राज्ञे राष्ट्रं समुन्नयति (अस्य-एषः-अनु-स्पष्टः-भवति) अस्य जनस्यायं राजानुगृहीतो विधाता भवति (मघवा) धनवान् राजा (तम्-अरत्नौ-निः-दधाति) तं स्वहस्ते रक्षणरूपहस्ते निश्चितं धारयति (अनानुदिष्टः-ब्रह्मद्विषः-हन्ति ) अकथितोऽपि तस्य ब्रह्मणो द्वेष्टारं हन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The lord keeps in close and direct vicinity the person who, like a generous prosperous man, creates and offers the soma of sincere dedication to him. He, lord of all power and glory, protects him in full security without the shackles, and even without prayer, destroys the enemies of positivity and divinity in the social order.