पदार्थान्वयभाषाः - [१] माता कहती है कि (अहं केतुः) = मैं ज्ञानवाली बनती हूँ। (अहं मूर्धा) = मैं अपने क्षेत्र में शिखर [top most ] घर पहुँचने का प्रयत्न करती हूँ। (अहं उग्रा) = मैं तेजस्विनी बनती हूँ । (विवाचनी) = प्रभु के नामों का विशेषरूप से उच्चारण करनेवाली होती हूँ। मस्तिष्क में ज्ञान, मन में शिखर पर पहुँचने की भावनावाली तथा शरीर में तेजवाली, प्रभु के नाम का सदा जप करनेवाली माता ही आदर्श है । [२] (सेहानायाः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव करनेवाली (मम) = मेरे (क्रतुं अनु) = संकल्प के अनुसार (इत्) = ही (पतिः) = मेरे पति उपाचरेत् कार्यों को करनेवाले हों। पत्नी तेजस्विनी व शान्त स्वभाववाली हो, क्रोध आदि से सदा दूर हो। इसके विचारों के अनुसार ही पति कार्यों को करते हैं । इस प्रकार पति-पत्नी का समन्वय होने पर ही उत्तम सन्तान हुआ करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आदर्श माता में 'ज्ञान- शिखर पर पहुँचने की भावना, तेज व प्रभु स्मरण की वृत्ति' होनी चाहिये। इस पत्नी को पति की अनुकूलता प्राप्त होती है और ये उत्तम सन्तानों को प्राप्त करते हैं ।