पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का आश्रय करके (यद्) = जब (ह) = निश्चय से प्राची: (अजगन्त) = गतिवाले होकर लोग चलते हैं, तो (उर:) = [उर्वी हिंसायाम्] वासनाओं का हिंसन करनेवाले होते हैं, (मण्डूरधाणिकी:) = [मन्दनस्य धनस्य धारयित्यः] आनन्दप्रद धनों का धारण करनेवाले होते हैं। प्रभु का भक्त कभी अनुचित उपायों से धनार्जन नहीं करता । [२] (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के (शत्रवः) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रु (हताः) = विनष्ट होते हैं। ये (सर्वे) = सब शत्रु (बुद्बुदयाशवः) = [यान्ति, अनुवते] बुलबुलों की तरह नष्ट हो जानेवाले होते हैं और व्यापक रूप को धारण करते हैं। बुलबुला फटा और पानी में मिलकर उसी में फैल गया [= विलीन हो गया]। इसी प्रकार 'काम' फटकर प्रेम का रूप धारण कर लेता है, क्रोध फटकर करुणा के रूप में हो जाता है और लोभ विनष्ट होकर त्याग का रूप धारण कर लेता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम कामादि शत्रुओं को नष्ट करके आगे बढ़नेवाले हों ।