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यद्ध॒ प्राची॒रज॑ग॒न्तोरो॑ मण्डूरधाणिकीः । ह॒ता इन्द्र॑स्य॒ शत्र॑व॒: सर्वे॑ बुद्बु॒दया॑शवः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad dha prācīr ajagantoro maṇḍūradhāṇikīḥ | hatā indrasya śatravaḥ sarve budbudayāśavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । ह॒ । प्राचीः॑ । अज॑गन्त । उरः॑ । म॒ण्डू॒र॒ऽधा॒णि॒कीः॒ । ह॒ताः । इन्द्र॑स्य । शत्र॑वः । सर्वे॑ । बु॒द्बु॒दऽया॑शवः ॥ १०.१५५.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:155» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मण्डूरधाणिकीः) मेंढकों को धारण करनेवाली बरसाती नदियाँ, जलाशय (यत्-ह) जबकि (प्राचीः-अजगन्त) सामने बह रही हों, तब (इन्द्रस्य शत्रवः) आत्मा के दुर्भिक्ष आदि शत्रु (हताः) नष्ट हो गये-नष्ट हो जाते हैं (सर्वे बुद्बुदयाशवः) सब पानी की बुद्बुदों की भाँति गतिवाले-अर्थात् शीघ्र नष्ट होनेवाले होते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - जब मेघ बरसने पर नाले मेंढकोंवाले नदी तालाब आदि सामने बहने लगें, तब दुर्भिक्ष आदि शत्रु पानी के बुद्बुदों की भाँति नष्ट हो जानेवाले होते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कामादि शत्रुओं का विनाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का आश्रय करके (यद्) = जब (ह) = निश्चय से प्राची: (अजगन्त) = गतिवाले होकर लोग चलते हैं, तो (उर:) = [उर्वी हिंसायाम्] वासनाओं का हिंसन करनेवाले होते हैं, (मण्डूरधाणिकी:) = [मन्दनस्य धनस्य धारयित्यः] आनन्दप्रद धनों का धारण करनेवाले होते हैं। प्रभु का भक्त कभी अनुचित उपायों से धनार्जन नहीं करता । [२] (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के (शत्रवः) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रु (हताः) = विनष्ट होते हैं। ये (सर्वे) = सब शत्रु (बुद्बुदयाशवः) = [यान्ति, अनुवते] बुलबुलों की तरह नष्ट हो जानेवाले होते हैं और व्यापक रूप को धारण करते हैं। बुलबुला फटा और पानी में मिलकर उसी में फैल गया [= विलीन हो गया]। इसी प्रकार 'काम' फटकर प्रेम का रूप धारण कर लेता है, क्रोध फटकर करुणा के रूप में हो जाता है और लोभ विनष्ट होकर त्याग का रूप धारण कर लेता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम कामादि शत्रुओं को नष्ट करके आगे बढ़नेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मण्डूरधाणिकीः) हे मण्डूराणां मण्डूकानाम् ‘कस्य रेफश्छान्दसः’ मडिधातोरुरच् प्रत्ययः, मण्डूकानां धारिका वार्षिकीरापो नद्यो जलाशयाः (यत्-ह) यत् खलु (प्राचीः-अजगन्त) प्रागञ्चन्त्यो गच्छन्ति, तदा (इन्द्रस्य) आत्मनः (शत्रवः) दुर्भिक्षप्रभृतयः (हताः) हताः परास्ता भवन्ति (सर्वे बुद्बुदयाशवः) सर्वेऽपि बुद्बुदवत्-यातारः-बुद्बुदवच्छीघ्रं नश्वराः भवन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When floods of water flow forth bearing iron ore, rejoicing as if with croaking frogs, all adversities, enemies of humanity, disappear like bubbles, at once.