उभयलोक विनाशिनी अदानवृत्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार यह अदानवृत्ति (इतः) = इस लोक के दृष्टिकोण से (चत्ता उ) = निश्चय से विनाशकारिणी है । (अमुतः) = परलोक के दृष्टिकोण से भी (चत्ता) = विनाश करनेवाली है । दानवृत्ति ही यज्ञियभावना है [यज्= दाने] अयज्ञिय भावनावाले का न इस लोक में कल्याम है, न उस लोक में। बिना इस यज्ञिय भावना के समाज का संगठन असम्भव है । उसके बिना ऐहिक कल्याण नहीं । दान के बिना परलोक में भी उत्तम गति नहीं । स्वार्थी पुरुष पशु-पक्षियों की योनि में ही जन्म लेते हैं। जितना स्वार्थ, उतना जीवन भोग-प्रधान। जितना-जितना भोग-प्रधान जीवन, उतना उतना निकृष्ट पशुओं की योनि में जन्म । [२] यह अदान की वृत्ति (सर्वा भ्रूणानि) = सब गर्भस्थ बालकों को भी (आरुषी) = हिंसित करनेवाली है। माता की कृपणता की वृत्ति गर्भस्थ बालक पर भी अनुचित प्रभाव पैदा करती है। गर्भस्थ बालक भी इसी वृत्ति का बनता है और इस प्रकार वह गर्भावस्था में ही अवनति के मार्ग पर चलना आरम्भ करता है । [३] इसलिए कहते हैं कि हे (ब्रह्मणस्पते) = ज्ञान के रक्षक ! (तीक्ष्णशृंग) = तीक्ष्ण तेजवाले ! तू (अराय्यम्) = इस अदानवृत्ति को (उदृषन्) = [उद्गमयन्] अपने जीवन से बाहिर [out = उद्] करता हुआ (इहि) = गति कर । अर्थात् हमारे सब व्यवहारों के अन्दर कृपणता को स्थान न हो, हमारे हृदयों में उदारता हो, नकि अदानवृत्ति ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - अदानवृत्ति उभयलोक विनाशिनी है, यह गर्भस्थ बालकों पर भी अनुचित प्रभाव पैदा करती है। हम अपने व्यवहारों में इस कृपणता को न आने दें।