वांछित मन्त्र चुनें

तप॑सा॒ ये अ॑नाधृ॒ष्यास्तप॑सा॒ ये स्व॑र्य॒युः । तपो॒ ये च॑क्रि॒रे मह॒स्ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tapasā ye anādhṛṣyās tapasā ye svar yayuḥ | tapo ye cakrire mahas tām̐ś cid evāpi gacchatāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तप॑सा । ये । अ॒ना॒धृ॒ष्याः । तप॑सा । ये । स्वः॑ । य॒युः । तपः॑ । ये । च॒क्रि॒रे । महः॑ । तान् । चि॒त् । ए॒व । अपि॑ । ग॒च्छ॒ता॒त् ॥ १०.१५४.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:154» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये तपसा) जो महानुभाव ब्रह्मचर्यरूप तप से-तपोबल से (अनाधृष्याः) कामवासना से विचलित न होने योग्य (ये तपसा) जो ब्रह्मचर्यरूप बल से (स्वः-ययुः) सुखविशेष को प्राप्त होते हैं (ये महः-तपः) जो महान् तप को-त्याग को (चक्रिरे) करते हैं (तान्-चित्) उन्हें भी (एव-अपि गच्छतात्) उनको भी तू प्राप्त हो उनसे ब्रह्मचर्यतप धारण करने के लिए ॥२॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मचर्यसेवन से कामवासना सता नहीं सकती, ब्रह्मचर्य से गृहस्थसुख विशेषरूप से भोग जा सकता है, ब्रह्मचर्य से वानप्रस्थ का पालन हो सकता है ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तपस्वी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (तपसा) = तप के द्वारा (अनाधृष्याः) = न धर्षण के योग्य बनते हैं, तपस्या के कारण जो वासनाओं से आक्रान्त नहीं होते हैं। (ये) = जो (तपसा) = तप के द्वारा (स्वः ययुः) = प्रकाशमय व सुखमय लोक को प्राप्त करते हैं, जिन्हें तप सुखी व ज्ञानदीप्त बनाता है । (ये) = जो (महः तपः) = महान् तप को (चक्रिरे) = करते हैं । [२] यह हमारे समीप आया हुआ बालक (चित्) = निश्चय से (तान् एव) = उन लोगों के ही (अपि गच्छतात्) = समीप प्राप्त होनेवाला हो । अर्थात् ये भी तप के द्वारा वासनाओं को कुचलनेवाला बने । तप के कारण प्रकाशमय लोक को प्राप्त करे, दीप्त बुद्धिवाला हो । खूब ही तपस्वी हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने सन्तानों को तपस्वी बनायें। जिससे वे वासनामय जीवन से हुए प्रकाशमय जीवनवाले बनें । दूर रहते
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ये तपसा-अनाधृष्याः) ये महानुभावास्तपोबलेन महता ब्रह्मचर्येण “ब्रह्मचर्येण तपसा” कामवासनया-अधृष्या न चालयितुं शक्याः (ये तपसा स्वः-ययुः) ये महानुभावास्तेनैव तपसा सुखविशेषं यान्ति (ये महः-तपः-चक्रिरे) ये महत्तपः-कुर्वन्ति (तान्-चित्-एव-अपि गच्छतात्) तान् चिदेवापि गच्छ तेभ्यो ब्रह्मचर्यं तपोधारणाय ॥२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - There are those who by tapas rise undaunted, those who by tapas rise to the heaven of bliss, and those who perform tapas of high order. The spirit of life flows for all of them, universally.