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त्वमि॑न्द्राभि॒भूर॑सि॒ विश्वा॑ जा॒तान्योज॑सा । स विश्वा॒ भुव॒ आभ॑वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvam indrābhibhūr asi viśvā jātāny ojasā | sa viśvā bhuva ābhavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । इ॒न्द्र॒ । अ॒भि॒ऽभूः । अ॒सि॒ । विश्वा॑ । जा॒तानि॑ । ओज॑सा । सः । विश्वा॑ । भुवः॑ । आ । अ॒भ॒वः॒ ॥ १०.१५३.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:153» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:11» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमेश्वर वा राजन् ! (त्वम्) तू (ओजसा) आत्मबल से (विश्वा जातानि) सब प्रसिद्ध हुई वस्तुओं पर (अभिभूः-असि) अभिभविता-अधिकर्त्ता है (सः) वह तू (विश्वाः-भुवः) सारी लोकभूमियों को या बढ़ी-चढ़ी शत्रुसेनाओं को (आभवः) स्वाधीन करता है या कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब उत्पन्न हुई वस्तुओं पर अधिकार करता है और सब लोकभूमियों को अपने अधीन रखता है और चलाता है, इसी प्रकार राजा राष्ट्र की समस्त खनिज वस्तुओं पर अधिकार करे तथा बढ़ी-चढ़ी शत्रु की सेना पर भी अपना प्रभाव रखे ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभिभूति द्वारा आभूति की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय व शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले बालक ! (त्वम्) = तू (विश्वाजातानि) = सब उत्पन्न हुए-हुए इन वासनारूप शत्रुओं को (ओजसा) = अपनी ओजस्विता से (अभिभूः असि) = पराभूत करनेवाला है। काम-क्रोध-लोभ से तू आक्रान्त नहीं होता । [२] (सः) = वह तू (विश्वा:) = सब (भुवः) = भूमियों को, 'अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय कोशों को (आभव:) = आभूतिवाला करता है। इन सब कोशों को तू ऐश्वर्य से परिपूर्ण करता है। अन्नमयकोश को 'तेज' से, प्राणमय को 'वीर्य' से, मनोमय को 'बल व ओज' से, विज्ञानमय को 'मन्यु' से, आनन्दमय को 'सहस्' तू परिपूर्ण करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-माता बालक को यह प्रेरणा देती है कि - [क] तूने काम-क्रोध आदि शत्रुओं को अभिभूत करना है, [ख] तथा अन्नमयादि सब कोशों को 'आभूति' [= ऐश्वर्य] वाला बनाना है । सम्पूर्ण सूक्त बालक के सुन्दर निर्माण का उल्लेख कर रहा है। इस निर्माण को करनेवाली, अत्यन्त संयत जीवनवाली, सन्तानों को भी नियन्त्रण में चलानेवाली 'यमी' अगले सूक्त की ऋषिका है । कठोपनिषद् के अनुसार 'यम' आचार्य है, 'यमी' आचार्य पत्नी । आचार्य पत्नी कुल में प्रविष्ट हुए हुए बालक के लिये आचार्य से कहती है कि इसे हम ऐसा बनायें कि यह ऊँचे ब्राह्मणों, क्षत्रिय व वैश्यों में जानेवाला हो। 'वह कैसे सन्तानों को बनाती है' इसका वर्णन इस सूक्त द्वारा करते हैं- -
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र त्वम्) हे परमेश्वर ! राजन् वा ! त्वम् (ओजसा विश्वा जातानि-अभिभूः-असि) आत्मबलेन सर्वाणि प्रसिद्धिं गतानि वस्तूनि खल्वभिभविता-भवसि (सः-विश्वाः-भुवः-आभवः) स त्वं सर्वाः-लोक-भूमीः-भवित्रीः शत्रुसेनाः-वा स्वाधीने करोषि कुरु वा ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You, Indra, are the supreme ruler over all things come into existence by your self-refulgence which indeed is the light and life of all the worlds. O ruler, you too be that all over the world.