पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमात्मन् ! (द्विषतः) = हमें प्रीति न करनेवाले द्वेषी पुरुष के (मनः) = मन को (अप) [यवया] = हमारे से पृथक् करिये। उसका द्वेष हमारे तक न पहुँचे । (जिज्यासत:) = हमारी वयोहानि को चाहते हुए पुरुष के (वधम्) = हनन साधन आयुधों को (अप) = हमारे से दूर करिये। [२] (मन्योः) = क्रोध से (वि) = हमें पृथक् रखिये। हम कभी क्रोधाभिभूत न हों। इस पर क्रोध से दूर करके (वरीयः) = उरुतर, अत्यन्त विशाल (शर्म) = सुख को (यच्छ) = हमें प्राप्त कराइये । (वधम्) = हननसाधन आयुधों को (यवया) = हमारे से पृथक् करिये। शत्रुओं के अस्त्र हमारे पर न गिरें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम द्वेष करनेवालों व आयुष्य की हानि करनेवालों से बच सकें। क्रोध से दूर होकर उत्कृष्ट सुख का अनुभव करें। सम्पूर्ण सूक्त अन्त: व बाह्य शत्रुओं के विजय की प्रेरणा दे रहा है। इन अन्तः व बाह्य शत्रुओं को जीतने की प्रेरणा माताओं ने ही देनी होती है। वे बालकों को लोरियों में ही इस प्रकार की प्रेरणायें देकर अपने बच्चों को देव बनाती हैं, सो 'देवजामयः' कहलाती हैं। इन्होंने बच्चों को इन्द्रियों का शासक 'इन्द्र' बनाता है, सो ये 'इन्द्रमातरः ' है । ये 'देवजामयः इन्द्रमातरः ' ही अगले सूक्त की ऋषिका है-