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यथा॑ दे॒वा असु॑रेषु श्र॒द्धामु॒ग्रेषु॑ चक्रि॒रे । ए॒वं भो॒जेषु॒ यज्व॑स्व॒स्माक॑मुदि॒तं कृ॑धि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathā devā asureṣu śraddhām ugreṣu cakrire | evam bhojeṣu yajvasv asmākam uditaṁ kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । दे॒वाः । असु॑रेषु । श्र॒द्धाम् । उ॒ग्रेषु॑ । च॒क्रि॒रे । ए॒वम् । भो॒जेषु॑ । यज्व॑ऽसु । अ॒स्माक॑म् । उ॒दि॒तम् । कृ॒धि॒ ॥ १०.१५१.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:151» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (उग्रेषु) क्रूर (असुरेषु) दुष्ट जनों के ऊपर (देवाः) मुमुक्षु विद्वान् (श्रद्धाम्) यथोचित धारणा-दैवी शक्ति को (चक्रिरे) प्रेरित करते हैं (एवं भोजेषु) ऐसे ही भोजन करानेवालों या देनेवालों में (यज्वसु) यज्ञ करानेवालों में (अस्माकम्) हमारे (उदितम्) आशीर्वादवचन को (कृधि) कल्याणप्रद कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - जीवन्मुक्त ऊँचे विद्वानों को चाहिये कि वे अपनी दैवी शक्ति का उपयोग उपदेश आदि द्वारा क्रूर दुष्ट जनों के प्रति प्रेरित करें, उनको यथार्थ मार्ग पर लावें, ऐसा करने में वे सफल हों, इसी प्रकार भोजन खिलानेवाले और यज्ञ करानेवाले यजमानों के प्रति अपना हार्दिक आशीर्वाद देकर उनका कल्याण साधें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रद्धा से शत्रु विजय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जैसे (देवा:) = देव (उग्रेषु) = अत्यन्त प्रबल (असुरेषु) = असुरों के विषय में, 'इन असुरों को हम अवश्य पराजित कर पायेंगे' इस प्रकार (श्रद्धां चक्रिरे) = श्रद्धा को करते हैं । अर्थात् इस पूर्ण विश्वास के साथ चलते हैं कि हम असुरों को पराजित करनेवाले होंगे। यह पूर्ण विश्वास ही उन्हें असुरों को पराभूत करने में समर्थ करता है । [२] (एवम्) = इस प्रकार (भोजेषु) = अतिथि यज्ञ में अतिथियों को भोजन करानेवालों में, (यज्वसु) = यज्ञशील पुरुषों में (अस्माकं उदिते) = हमारे इस श्रद्धा के महत्त्व प्रतिपादक कथन को (कृधि) = श्रद्धेय करिये । अर्थात् ये भोज व यज्वा पुरुष श्रद्धा के महत्त्व को समझते हुए भोज व यज्वा बने ही रहें। इन यज्ञों से ये पराङ्मुख न हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हमें श्रद्धा ही शत्रुओं को पराजित करने में समर्थ करेगी। |
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा-उग्रेषु-असुरेषु) यथा क्रूरेषु-अस्तव्यस्तेषु दुष्टजनेषु तेषामुपरि (देवाः श्रद्धां चक्रिरे) मुमुक्षवो विद्वांसो यथोचितधारणां दैवीं शक्तिं प्रेरयन्ति (एवं भोजेषु यज्वसु अस्माकम्-उदितम् कृधि) एवं भोजनदातृषु तथा यजमानेषु खल्वस्माकमिदमाशीर्वचनं कल्याणप्रदं कुरु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as noble and creative powers have faith in how they must deal with the cruel and the evil doers, so let my word of faith and truth be justified in relation to the generous and the yajnics for their success and fulfilment.