पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में वनस्थ 'पिता, पितामह व प्रपितामह' आदि पितरों के घर पर आने का संकेत था । ये पितर सन्तानों के आमन्त्रण पर उनकी समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से घरों पर आते हैं। ये पितर (अरुणीनाम्) = [अरुणो गाव उपसाम्] उषाकालों की अरुण किरणों के प्रकाश के होने पर (उपस्थे आसीनासः) = उपासना में आसीन होते हैं । इस प्रकार प्रातः प्रभु उपासन में आसीन होनेवाले पितरो ! (दाशुषे मर्त्याय) = अपना समर्पण करनेवाले मनुष्य के लिये (रयिं धत्त) = ऐश्वर्य को धारण करिये। यदि घर में भाई परस्पर संघर्ष में आ जायें और न्यायालय में एक दूसरे को अभियुक्त करने पर तुल जायें, तो घर की सम्पत्ति की इति श्री ही हो जाए। सन्तानों के पुकारने पर पितर आते हैं । पुत्र उनके प्रति अपना अर्पण कर देते हैं कि 'जो कुछ पिताजी निर्णय करेंगे वह ठीक है'। इस प्रकार प्रतिज्ञा पत्र लिख देनेवाले सन्तान ही 'दाश्वान् मर्त्य' हैं। इन्होंने पिताजी पर सब कुछ छोड़ दिया है। [२] ऐसा होने पर हे (पितरः) = पितरो ! आप (पुत्रेभ्यः) = सन्तानों के लिये (तस्य) = उस (वस्वः) = धन का (प्रयच्छत) = दान करो जो कि न्यायालयों में ही समाप्त हो जाना था । यदि ये पितर निर्णय न कर देते घर का सारा धन अभियोग में ही व्ययित हो जाता। [३] इस प्रकार पितरों के निर्देश से धन का अपव्यय होने से तो बचाव हुआ ही, साथ ही भाइयों के मेल बने रहने से घर की शक्ति भी बढ़ गई । सो कहते हैं कि (ते) = वे आप (इह) = इस घर में (ऊर्जम्) = बल व प्राण शक्ति को (दधात) = धारण करिये। एक और एक मिलकर ये भाई ग्यारह हो गये हैं । एवं पितरों ने घर को श्री व शक्ति सम्पन्न बना दिया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - पितर प्रातः ही प्रभु उपासन में बैठते हैं। ये सन्तानों के कलहों को समाप्त करके घर में 'वसु व ऊर्ज' की स्थापना करते हैं।