शान्ति - निर्भयता व निर्दोषता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बर्हिषदः) = यज्ञों में आसीन होनेवाले (पिता:) = रक्षक लोगो ! (अती) = हमारे रक्षण के हेतु से (अर्वाक्) = आप हमें समीपता से प्राप्त होइये । (इमा हव्या) = इन हव्य पदार्थों को हम (वः चक्रमा) = आपके लिये संस्कृत करते हैं। (जुषध्वम्) = आप उन वस्तुओं का प्रीतिपूर्वक सेवन करिये । वस्तुतः 'माता-पिता की सेवा करना, उनको खिलाकर ही खाना' यह पितृयज्ञ है और यही एक गृहस्थ का प्रत्यक्ष धर्म है। ये पितर अपने क्रियात्मक उदाहरण से हमारे जीवनों में यज्ञ को प्रेरित करते हैं। स्वयं यज्ञशील होते हुए वे हमें यज्ञशील बनाते हैं । [२] हे पितरो ! (ते) = वे आप लोग (शन्तमेन) = अत्यन्त शान्ति को देनेवाले (अवसा) = रक्षण से (आगत) = हमें प्राप्त होइये । (अथा) = और (नः) = हमारे लिये (शंयोः) = शान्ति को तथा भयों के यावन [पृथक् करण] को, और (अरपः) = निर्दोषता को (दधात) = धारण करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें पितरों का आदर करना चाहिए। ये यज्ञशील पितर हमारा रक्षण करते हुए हमें 'शान्ति - निर्भयता व निर्दोषता' प्राप्त कराते हैं।