वांछित मन्त्र चुनें

बर्हि॑षदः पितर ऊ॒त्य१॒॑र्वागि॒मा वो॑ ह॒व्या च॑कृमा जु॒षध्व॑म् । त आ ग॒ताव॑सा॒ शंत॑मे॒नाथा॑ न॒: शं योर॑र॒पो द॑धात ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

barhiṣadaḥ pitara ūty arvāg imā vo havyā cakṛmā juṣadhvam | ta ā gatāvasā śaṁtamenāthā naḥ śaṁ yor arapo dadhāta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बर्हि॑ऽसदः । पि॒त॒रः॒ । ऊ॒ती । अ॒र्वाक् । इ॒मा । वः॒ । ह॒व्या । च॒कृ॒म॒ । जु॒षध्व॑म् । ते । आ । ग॒त॒ । अव॑सा । शम्ऽत॑मेन । अथ॑ । नः॒ । शम् । योः । अ॒र॒पः । द॒धा॒त॒ ॥ १०.१५.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:15» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बर्हिषदः पितरः-ऊती-अर्वाक्-वः-इमा हव्या-चकृम जुषध्वम्) यज्ञासन पर बैठे हुए हे विद्वानो ! हम अपनी रक्षा के लिये तुम्हारे वास्ते होम की वस्तुओं को तैयार करते हैं, इनको तुम अग्नि में डालकर काम में लाओ (ते शंतमेन-अवसा-आगत नः-अरपः शंयोः-दधात) वे तुम विद्वानो ! सुखमय रक्षण के कारण सदा प्राप्त हुआ करो और हमारे लिये शुद्धभाव, रोगनिवृत्ति और भय के दूरीकरण का उपाय करते रहो ॥४॥
भावार्थभाषाः - यज्ञ में विद्वानों को निमन्त्रित करके उनसे अपनी रोगनिवृत्ति और आपत्तियों से बचने के लिये कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शान्ति - निर्भयता व निर्दोषता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बर्हिषदः) = यज्ञों में आसीन होनेवाले (पिता:) = रक्षक लोगो ! (अती) = हमारे रक्षण के हेतु से (अर्वाक्) = आप हमें समीपता से प्राप्त होइये । (इमा हव्या) = इन हव्य पदार्थों को हम (वः चक्रमा) = आपके लिये संस्कृत करते हैं। (जुषध्वम्) = आप उन वस्तुओं का प्रीतिपूर्वक सेवन करिये । वस्तुतः 'माता-पिता की सेवा करना, उनको खिलाकर ही खाना' यह पितृयज्ञ है और यही एक गृहस्थ का प्रत्यक्ष धर्म है। ये पितर अपने क्रियात्मक उदाहरण से हमारे जीवनों में यज्ञ को प्रेरित करते हैं। स्वयं यज्ञशील होते हुए वे हमें यज्ञशील बनाते हैं । [२] हे पितरो ! (ते) = वे आप लोग (शन्तमेन) = अत्यन्त शान्ति को देनेवाले (अवसा) = रक्षण से (आगत) = हमें प्राप्त होइये । (अथा) = और (नः) = हमारे लिये (शंयोः) = शान्ति को तथा भयों के यावन [पृथक् करण] को, और (अरपः) = निर्दोषता को (दधात) = धारण करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें पितरों का आदर करना चाहिए। ये यज्ञशील पितर हमारा रक्षण करते हुए हमें 'शान्ति - निर्भयता व निर्दोषता' प्राप्त कराते हैं।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बर्हिषदः पितरः ऊती-अर्वाक्-वः-इमा हव्या-चकृम जुषध्वम्) यज्ञासन उपविष्टा ऊती-ऊत्यै-अस्मद्रक्षायै “सुपां सुपो भवन्ति” [अष्टा०७।१।३९ वार्तिकम्] विभक्तिव्यत्ययः। अत्र यज्ञे युष्मभ्यमिमानि हव्यानि कुर्मः सम्पादयामः सज्जीकुर्मो यूयं जुषध्वमग्नौ प्रक्षेपार्थं प्रयुङ्ध्वम् (ते शंतमेन-अवसा-आगत नः अरपः शंयोः दधात) ते यूयं विद्वांसः सुखमयेन रक्षणेन सदैव प्राप्नुत, अस्मभ्यं पापरहितं भावं रोगाणां शमनं यावनं च भयानां धारयत, तथा च निरुक्तम् [४।११] ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O parental powers of humanity, scholars of the science of atmospheric and environmental management of the globe, for all round peace and protection of life here and hereafter, we have prepared these yajnic materials for you for homage which please accept and use with love and faith. O masters, come always with peaceful modes of universal protection, bear and bring us showers of peace and freedom from sin, violence and fear.