पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (च) = और (पितरः) = पितर (इह) = यहाँ घर पर ही हैं, (ये च) = और जो वनस्थ हो जाने के कारण (इह न) = यहाँ घर पर नहीं हैं। (यान् च) = और जिनको (विद्म) = हम अच्छी प्रकार जानते हैं, क्योंकि उनसे हमने अध्ययन किया है सो वे आचार्य तो हमारे परिचित हैं ही । (यान् उ च) = और जिनको निश्चय से (न प्रविद्म) = हम नहीं जानते, अर्थात् जो 'यत्र सायं गृहमुनि' घूमते-घामते आज हमारे घर पर आ उपस्थित हुए हैं, जिनसे हमारा पूर्व परिचय नहीं है, सब अतिथियों का परिचय सम्भव भी तो नहीं। [२] परन्तु परिचित हों व अपरिचित, इस समय तो, हे (जातवेदः) = नैत्यिक स्वाध्याय के द्वारा विचारशील पुरुष (त्वं वेत्थ) = आप जानते ही हो कि (ते यति) = वे जितने हैं । उनकी संख्या को आप सम्यक् जानते ही हो । आप (स्वधाभिः) = अन्नों के द्वारा (सुकृतम्) = बड़ी सुन्दरता से समादित (यज्ञम्) = पितृयज्ञ का (जुषस्व) = सेवन करें। अर्थात् उन सब पितरों को बड़े आदर से आप भोजन कराएँ। यह पितृयज्ञ भी पंच महायज्ञों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है । इसके होने पर घरों में सदाचार की प्रेरणा सदा प्राप्त होती रहती है और किसी प्रकार के पतन की आशंका नहीं रहती। [३] जो पितर वनस्थ भी होते हैं वे समय-समय पर सन्तानों से आमन्त्रित होने पर घरों पर आते हैं, और उन सन्तानों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करते हैं। आचार्यों को भी ये कभी-कभी आमन्त्रित करते ही हैं और संन्यासी तो घूमते-फिरते अतिथिरूपेण आ ही जाते हैं। इन सब पितरों को स्वधा के द्वारा तृप्त करना ही पितृयज्ञ है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - घर में आये हुए पितरों का अन्न द्वारा सत्कार करना 'पितृयज्ञ' है। प्रत्येक गृहस्थ का यह आवश्यक कर्तव्य है ।