पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = प्रगतिशील जीव ! (त्वम्) = तू (ईडितः) [ईडा संजाता अस्य इति, ईडा+इतच् ] = उपासना वाला बनता है प्रात:काल उठकर सबसे प्रथम तू प्रभु का उपासन करता है। वस्तुत: हमें जीवन के प्रत्येक दिन को प्रभु के उपासन से ही प्रारम्भ करना चाहिये तथा दिन की समाप्ति व रात्रि का प्रारम्भ भी प्रभु उपासन से ही होना चाहिए। [२] उपासन के बाद तू नैत्यिक स्वाध्याय के द्वारा (जातवेदः) = [जातः वेदो यस्य] विकसित ज्ञानवाला बनता है । उपासना की तरह स्वाध्याय में भी हमें किसी प्रकार से भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। [३] स्वाध्याय के बाद तू (सुरभीणिः) = सुगन्धित हव्यानि हव्य पदार्थों को (कृत्वी) = सम्यक् बनाकर के (अवाट्) = अग्नि के लिये प्राप्त कराता है । अर्थात् शुद्ध सुगन्धित गोघृत व उत्तम सामग्री से तू नैत्यिक अग्निहोत्र को करता है । [४] अब अग्निहोत्र कर चुकने पर तू (पितृभ्यः प्रादा:) = अपने वृद्ध माता-पिता के लिये भोजन को देता है । और (ते) = वे पितर (स्वधया) = आत्म-धारण के हेतु से अर्थात् शरीर के धारण के लिये आवश्यक मात्रा में (अक्षन्) = उस भोजन को खाते हैं। [५] इस प्रकार पितृयज्ञ को करके हे (देव) = दिव्य गुणों से सम्पन्न अग्ने ! (त्वम्) = तू भी (प्रयता) = पवित्र हवींषि देवयज्ञ व पितृयज्ञ से अवशिष्ट हव्य पदार्थों को (अद्धि) = सेवन करनेवाला बन। यह यज्ञशेष तेरे लिये अमृत हो, अमृत का सेवन करता हुआ तू सचमुच 'देव' बन ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - एक आर्यपुरुष की दिनचर्या का क्रम 'उपासना, स्वाध्याय, अग्निहोत्र, पितृयज्ञ व स्वयं भी यज्ञशेष का सेवन' है। इस क्रम का अनुष्ठान करता हुआ वह देव बनता है।