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अ॒र्यो वा॒ गिरो॑ अ॒भ्य॑र्च वि॒द्वानृषी॑णां॒ विप्र॑: सुम॒तिं च॑का॒नः । ते स्या॑म॒ ये र॒णय॑न्त॒ सोमै॑रे॒नोत तुभ्यं॑ रथोळ्ह भ॒क्षैः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aryo vā giro abhy arca vidvān ṛṣīṇāṁ vipraḥ sumatiṁ cakānaḥ | te syāma ye raṇayanta somair enota tubhyaṁ rathoḻha bhakṣaiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒र्यः । वा॒ । गिरः॑ । अ॒भि । अ॒र्च॒ । वि॒द्वान् । ऋषी॑णाम् । विप्रः॑ । सु॒ऽम॒तिम् । च॒का॒नः । ते । स्या॒म॒ । ये । र॒णय॑न्त । सोमैः॑ । ए॒ना । उ॒त । तुभ्य॑म् । र॒थ॒ऽओ॒ळ्ह॒ । भ॒क्षैः ॥ १०.१४८.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:148» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रथोढ) हे रमणीय मोक्षपद पर सदा वर्तमान नित्यमुक्त परमात्मन् ! (अर्यः) स्वामी (विद्वान्) सर्वज्ञ (वा) और (विप्रः) विशेष तृप्त करनेवाला (ऋषीणाम्) मन्त्रद्रष्टा विद्वानों की (सुमतिम्) सुन्दर वाणी स्तुति को (चकानः) कामना करता हुआ (गिरः) उनकी वाणियों का (अभि-अर्च) स्वागत कर (ये-एना) जो इन (भक्षैः सोमैः-उत) भजनीय सेवनीय उपासनारसों से भी (तुभ्यं रणयन्त) तेरे अन्दर रमण करते हैं (ते स्याम) वह तेरे हम होवें ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा मोक्षपद में सदा वर्तमान, नित्यमुक्त, स्वामी, सर्वज्ञ और तृप्त करनेवाला है, ऋषियों की स्तुति का स्वागत करनेवाला है, जो भजनीय स्तुतियों से तेरे अन्दर रमण करते हैं, वे तेरे हो जाते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण व सात्त्विक भोजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (अर्य:) = स्वामी तथा (विद्वान्) = ज्ञानी आप (ऋषीणाम्) = [ऋष् गतौ ] गतिशील पुरुषों के (विप्रः) = विशेषरूप से पूरण करनेवाले हैं। इस पूरण के लिये ही (सुमतिं चकान:) = उनकी सुमति की आप कामना करते हैं। आप उन ऋषियों को सुमति प्राप्त कराते हैं। आप (वा) = निश्चय से (गिरः) = इनकी ज्ञान की वाणियों को (अभ्यर्च) = [अर्च् to shire] दीप्त कीजिये। इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा ही तो ये अपने जीवन की न्यूनताओं को दूर कर पायेंगे। [२] वे इन (ते स्याम) = आपके हों, हमारा झुकाव आपकी ओर हो, हम प्रकृति में फँस न जायें। (ये) = जो हम (सोमैः रणयन्त) = सोमरक्षण के द्वारा आपको अपने जीवन में रममाण करते हैं। जितना जितना हम सोम का रक्षण करते हैं, उतना उतना ही हम प्रभु के प्रिय बनते हैं । हे (रथोढ) = शरीररूप रथ के द्वारा वहन किये जानेवाले प्रभो ! हम इन शरीर रथों के आपकी ओर ही आनेवाले बनते हैं। (एना) = इस सोम के द्वारा (उत) = और (भक्षैः) = सात्त्विक भोजनों के द्वारा (तुभ्यम्) = हम आपके लिये ही गतिवाले होते हैं। भोजनों को भी हम इस दृष्टिकोण से खाते हैं कि हम सात्त्विक बुद्धिवाले बनकर आपकी ओर गतिवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमें सुमति देते हैं, हमारी ज्ञानवाणियों को दीप्त करते हैं। सोम का रक्षण करते हुए व सात्त्विक भोजनों का सेवन करते हुए हम आपकी ओर बढ़ें, आपके प्रिय हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रथोढ) रमणीयमोक्षपदे सदा वर्त्तमान नित्यमुक्त परमात्मन् ! (अर्यः) स्वामी (विद्वान्) सर्वज्ञ (वा) च (विप्रः) विशेषेण प्रीणयिता (ऋषीणां-सुमतिं चकानः) मन्त्रदृष्टॄणां सुवाचं स्तुतिम् “वाग्वै मतिः” [श० ८।१।२।७] कामयमानाऽसि, अतः (गिरः-अभि-अर्च) तेषां स्तुतिवाचः प्रशंसय-स्वागतीकुरु (ये-एना भक्षैः-सोमैः उत तुभ्यं रणयन्त) ये-उपासकाः एतै भजनीयैः-सेवनीयैः “भक्षः सेवनीयः” [यजु० ८।३७ दयानन्दः] उपासनारसैरपि तुभ्यं-‘त्वयि विभक्तिव्यत्ययः, रमणं कुर्वन्ति ते वयम्’ (ते स्याम) तव भवेम ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of the cosmic chariot, ruler protector of the universe, vibrant and omniscient Indra, lover of the sages’ songs of adoration, pray accept and honour our words of prayer so that, serving and celebrating you with delicious homage of soma and ourselves exulting, we may ever abide in your gracious favour and presence.