ऊर्ध्वरेता को प्रभु-दर्शन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (ऋत्वा) = दर्शनीय व महान् [ऋष्वः =महान् दर्शनीयो वा सा० ] (जातः) = प्रसिद्ध हैं, आपका मेरे में प्रादुर्भाव हुआ है। मैंने आज आपका दर्शन किया है। आप इन (दासी:) = मेरा उपक्षय करनेवाली (विशः) = मेरे न चाहते हुए भी मेरे में घुस आनेवाली अशुभ काम आदि वृत्तियों को (सूर्येण) = ज्ञान सूर्य के उदय से सह्या:- पराभूत करिये आपकी कृपा से मेरे मस्तिष्क गगन में ज्ञान सूर्य का उदय हो और इन वासनान्धकारों का विनाश हो जाये । [२] (गुहाहितम्) = बुद्धिरूप गुहा में स्थापित (गुह्यम्) = अत्यन्त रहस्यमय, (दुर्ज्ञेय अप्सु गूढम्) = सब प्रजाओं में अन्तर्हित रूप से वर्तमान आपको हम (बिभृमसि) = धारण करते हैं, अपने हृदयदेश में देखने का प्रयत्न करते हैं, (न) = जिस प्रकार (प्रस्त्रवणे) = प्रकृष्ट गति में, ऊर्ध्वगति में (सोमम्) = सोम का धारण करते हैं। जितना जितना हम सोम का ऊर्ध्वगमन कर पाते हैं उतना उतना ही हम आपको धारण करनेवाले बनते हैं । इस सोम [= वीर्य ] के धारण से ही उस सोम [प्रभु] का धारण होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का प्रकाश होते ही वासनान्धकार विनष्ट हो जाता है। हृदयस्थ प्रभु का दर्शन ऊर्ध्वरेता बनने पर ही होता है।