पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (अस्य) = इस प्रभु के (रंह्यम्) = वेग से युक्त, अर्थात् स्फूर्तियुक्त क्रियाओंवाले (मदम्) = हर्ष को (चिकेतति) = जानता है, (सः) = वह उपासक (इत् नु) = निश्चय से (सुभृतस्य रायः) = उत्तम उपायों से जिसका भरण किया गया है, उस धन की (चाकन्) = कामना करता है। जिस उपासक को उपासना में कुछ आनन्द का अनुभव होने लगता है, उसका जीवन क्रियाशील तो होता ही है, साथ ही वह उत्तम उपायों से ही धन को कमाने की कामना करता है। [२] (त्वावृधः) = आपकी भावना को अपने में बढ़ानेवाला, (दाश्वध्वरः) = दानयुक्त यज्ञोंवाला, अर्थात् यज्ञों में खूब दान देनेवाला (सः) = वह उपासक, हे (मघवन्) = ऐश्वर्यवान् प्रभो ! (मक्षू) = शीघ्र ही (नृभिः) = मनुष्यों के साथ (वाजम्) = शक्ति को तथा (धना) = धनों को (भरते) = सम्पादित करता है इसको मित्रों की भी प्राप्ति होती है तथा यह शक्ति व धन का भी अर्जन करनेवाला बनता है। इस प्रकार इसका सांसारिक जीवन भी बड़ा उत्तम बन जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- उपासक सुपथ से ही धन कमाता है। ध्यान व यज्ञों को अपनाता हुआ यह =सन्ध्या-हवन करता हुआ) 'मित्रों-शक्ति व धनों' को प्राप्त करके सुखी व शान्त जीवनवाला बनता है ।