पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले परमात्मन्! आप (एषु) = इन (सूरिषु) = ज्ञानी पुरुषों में (आचाकन्धि) = विशेषरूप से दीप्त होइये । हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप उन ज्ञानियों में दीस होइये (ये) = जो (वृधासः) = वृद्धि को प्राप्त होते हुए (मघं आनशुः) = धन को व्याप्त करते हैं। वस्तुतः जहाँ धन के साथ ज्ञान तथा दिव्यगुणों के वर्धन का भाव हो वहीं प्रभु का प्रकाश होता है । [२] ये ज्ञानी पुरुष (वाजिनम्) = शक्तिशाली आपको [ प्रभु को ] (अर्चन्ति) = पूजते हैं । इसलिए पूजते हैं कि—[क] (तोके तनये) = उत्तम पुत्र-पौत्रों को वे प्राप्त करनेवाले हों । तोकों व तनयों के निमित्त वे प्रभु का पूजन करते हैं । वस्तुतः जिस घर में प्रभु-पूजन चलता है, वहाँ सन्तान उत्तम बनते ही हैं। [ख] (परिष्टिषु) = परितः इष्यमाण अन्य फलों के निमित्त वे प्रभु का पूजन करते हैं । 'पति- पत्नी का परस्पर प्रेम, मित्रों का सच्चा मित्र प्रमाणित होना' इत्यादि ऐसी बातें हैं जो जीवन को सुखी व उन्नत बनाने के लिये आवश्यक ही हैं। [ग] (मेधसाता) = यज्ञों के निमित्त वे प्रभु का पूजन करते हैं। इसलिए प्रभु-पूजन करते हैं कि उनकी प्रवृत्ति यज्ञविषयक बनी रहे। [घ] (अह्रये धने) = अलज्जाकर धन के निमित्त ये प्रभु का पूजन करते हैं। प्रभु-पूजक पवित्र साधनों से धन का अर्जन कर पाता है और संसार यात्रा को ठीक प्रकार से चलानेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'ज्ञान, दिव्यगुणवर्धन व धन' का जहाँ मेल होता है वहाँ प्रभु का प्रकाश होता है। प्रभु का उपासक 'उत्तम सन्तानों, अन्य वाञ्छनीय बातों, यज्ञों व पवित्र धनों' को प्राप्त करता है ।