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आञ्ज॑नगन्धिं सुर॒भिं ब॑ह्व॒न्नामकृ॑षीवलाम् । प्राहं मृ॒गाणां॑ मा॒तर॑मरण्या॒निम॑शंसिषम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āñjanagandhiṁ surabhim bahvannām akṛṣīvalām | prāham mṛgāṇām mātaram araṇyānim aśaṁsiṣam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आञ्ज॑नऽगन्धिम् । सु॒र॒भिम् । ब॒हु॒ऽअ॒न्नाम् । अकृ॑षिऽवलाम् । प्र । अ॒हम् । मृ॒गाणा॑म् । मा॒तर॑म् । अ॒र॒ण्या॒निम् । अ॒शं॒सि॒ष॒म् ॥ १०.१४६.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:146» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:4» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आञ्जनगन्धिम्) रसाञ्जन गन्धवाली (सुरभिम्) सुगन्धयुक्त-सुगन्धवाली (अकृषिवलाम्) किसानों को अपेक्षित न करती हुई (बह्वन्नाम्) बहुत प्रकार के खाने योग्य वस्तुवाली (मृगाणां मातरम्) जंगली पशुओं की माता (अरण्यानिम् अशंसिषम्) अरण्यानी को प्रशंसित करता हूँ ॥६॥
भावार्थभाषाः - अरण्यानी में रसाञ्जन गन्ध और अन्य सुगन्धवाले पत्ते फूलवाले वृक्ष होते हैं और विना किसानों के बोए बहुत प्रकार के खाद्य पदार्थ-अन्न होते हैं, भाँति-भाँति के जंगली पशु भी उसमें होते हैं, ऐसे गुणोंवाली अरण्यानी प्रशंसनीय है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आत्मनिरीक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं (अरण्यानिम्) = इस वनस्थ वृत्ति का (प्र अशंसिषम्) = प्रकर्षेण शंसन करता हूँ जो वनस्थ वृत्ति (आञ्जनगन्धिम्) = [ अञ्जनम् = right] अज्ञानान्धकार की रात्रि को विनष्ट करनेवाली है। (सुरभिम्) = [wise, learued, good, virtuous ] ज्ञान को बढ़ानेवाली व दिव्यता को विकसित करनेवाली है। बहु (अन्नाम्) = ' शान्तिर्वा अन्नं' [ऐ० ५। ७] बहुत शान्तिवाली है। वनस्थ वृत्ति में पुरुष हबड़ - दबड़ [भागदौड़] को छोड़कर शान्त वृत्ति को धारण करने का प्रयत्न करता है। (अकृषीवलाम्) = [अ - कृषी-वल] चीर-फाड़ [कृषः to tear] के आवरणों से रहित हो । वनस्थ वृत्ति में दूसरों को कष्ट में डालने की प्रवृत्ति ही नहीं रहती । [२] (मृगाणां मातरम्) = यह वनस्थ वृत्ति [मृग अन्वेषणे] आत्मनिरीक्षण करनेवालों का निर्माण करनेवाली है। इस वानप्रस्थ ने मुख्यरूप से आत्मनिरीक्षण करते हुए, अपने जीवन को पवित्र बनाकर, प्रभु का दर्शन करना है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गृहस्थोपरान्त हम वनस्थ वृत्ति को अपनाएँ । सब अज्ञानों को दूर करते हुए, आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने को पवित्र बनाएँ और प्रभु-दर्शन का प्रयत्न करें। इस सूक्त में वानप्रस्थ का सुन्दर चित्रण हुआ है यह ग्राम को भूलने का प्रयत्न करता है। [१] प्रभु की वाणियों में जीवन के शोधन का प्रयत्न करता है। [२] सादा जीवन बिताते हुए शून्यावस्था को जाने का अभ्यास करता है। [३] 'स्वाध्याय, वासनाविदारण, प्रभु स्मरण' इसके मुख्य कार्यक्रम हैं । [४] अहिंसा की वृत्ति को अपनाता हुआ क्रियाशील बनता है। [५] आत्मनिरीक्षण करता हुआ प्रभु-दर्शन के लिए यत्नशील होता है। [६] निरन्तर स्वाध्याय आदि के द्वारा यह 'सुवेदा: ' उत्तम ज्ञानैश्वर्यवाला बनता है। ज्ञान द्वारा वासनाओं को शीर्ण करनेवाला 'शैरीषि' होता है। यह प्रभु प्रार्थना करता हुआ कहता है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आञ्जनगन्धिम्) रसाञ्जनगन्धस्येव गन्धोऽस्या इत्याञ्जनगन्धिस्तां (सुरभिम्) सुगन्धोपेतां (अकृषीवलां बह्वन्नाम्) कृषकैरनपेक्षितां बहुविधान्नयुक्तां (मृगाणां मातरम्) वन्यपशूनां मातरम् (अरण्यानिम्-अशंसिषम्) अरण्यानीं प्रशंसामि ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I revere and celebrate the forest and the spirit of the forest not subjected to human encroachment by farming, abounding in wild fruit, fragrant, flowery beautiful, mother of wild life and sustaining friend of humanity.