प्रभु की वाणियों में जीवन का शोधन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (चित् चिक:) = ज्ञान का संचय करनेवाला (अरण्यानिः) = यह गति व ज्ञान में उत्तम वनस्थ पुरुष वृषारवाय उस ज्ञान के वर्षक शब्दोंवाले (वदते) = ज्ञानोपदेश देनेवाले, ऋग्यजु, सामरूप तीन वाणियों का उच्चारण करनेवाले, प्रभु के लिये (उप अवति) = समीप प्राप्त होता है, तो (आघाटिभिः इव) = मानो वीणा की तन्त्रियों के शब्दों से ही (धावयन्) = अपने जीवन को शुद्ध करता हुआ (महीयते) = महिमा को अनुभव करता है। [२] वानप्रस्थ का मूल कर्त्तव्य प्रभु का उपासन है। जब यह प्रभु की उपासना करता है तो हृदयस्थ प्रभु की ज्ञानवाणियों से इसकी हत्तन्त्री बज उठती है। उन हृत्तन्त्री के स्वरों में यह उपासक स्नात हो उठता है। जैसे एक उत्कृष्ट वाद्य के स्वर में लीन हुआ हुआ पुरुष चित्तवृत्ति को एकाग्र कर पाता है, इसी प्रकार यह उपासक प्रभु में लीन हुआ हुआ चित्तवृत्ति को विषयों में भटकने से बचा पाता है। इस प्रकार यह उन हत्तन्त्री के स्वरों में स्नान करता हुआ शुद्ध जीवनवाला बन जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ–वनस्थ होकर हम प्रभु के उपासन में लीन हो जायें। प्रभु की वाणियों में अपने जीवन को शुद्ध कर डालें।