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वृ॒षा॒र॒वाय॒ वद॑ते॒ यदु॒पाव॑ति चिच्चि॒कः । आ॒घा॒टिभि॑रिव धा॒वय॑न्नरण्या॒निर्म॑हीयते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣāravāya vadate yad upāvati ciccikaḥ | āghāṭibhir iva dhāvayann araṇyānir mahīyate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृ॒षा॒ऽर॒वाय॑ । वद॑ते । यत् । उ॒प॒ऽअव॑ति । चि॒च्चि॒कः । आ॒घा॒टिभिः॑ऽइव । धा॒वय॑न् । अ॒र॒ण्या॒निः । म॒ही॒य॒ते॒ ॥ १०.१४६.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:146» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - यहाँ से अरण्यानी का स्वरूप कहा जाता है। (वृषरवाय वदते) मन में सुखवर्षक शब्द या निरन्तर मेघवर्षण की भाँति मधुर शब्द करनेवाले पङ्खवाले सुक्ष्मजन्तु भिल्ली, झिङ्गुर झिङ्गा नामवाले बोलते हुए वीणावाद्य के समान (चिच्विकः-यत्-उपावति) चिच्-चिक् ऐसा श्ब्दानुकरण थोड़ा ठहर-ठहर कर करनेवाला पक्षहीन सूक्ष्म जन्तु वृक्ष से चिपटा हुआ पूर्व झिङ्गुर के शब्द को अनुपोषित करता है (आघाटिभिः-इव) सस्वर उच्चारण करनेवाले गायकों की भाँति (धावयन्) स्वर को प्रसारित करते हैं, इस प्रकार विविध बाजे गानों के द्वारा (अरण्यानि महीयते) अरण्यानी प्रशस्त की जाती है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मन में सुख वर्षानेवाले मेघवर्षण के समान मधुर ध्वनि करनेवाला झिङ्गुर और उसका अनुपोषण शब्द करनेवाला चिच् चिक् वृक्ष से लिपटा हुआ सूक्ष्म जन्तु सस्वर गाने जैसे उच्चारण करनेवाला सूक्ष्म जन्तु जहाँ इस प्रकार गाना बजाना कर रहे होते हैं, वह अरण्यानी है, जो जङ्गल में घूमनेवालों के लिए बहुत रुचिकर है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की वाणियों में जीवन का शोधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जब (चित् चिक:) = ज्ञान का संचय करनेवाला (अरण्यानिः) = यह गति व ज्ञान में उत्तम वनस्थ पुरुष वृषारवाय उस ज्ञान के वर्षक शब्दोंवाले (वदते) = ज्ञानोपदेश देनेवाले, ऋग्यजु, सामरूप तीन वाणियों का उच्चारण करनेवाले, प्रभु के लिये (उप अवति) = समीप प्राप्त होता है, तो (आघाटिभिः इव) = मानो वीणा की तन्त्रियों के शब्दों से ही (धावयन्) = अपने जीवन को शुद्ध करता हुआ (महीयते) = महिमा को अनुभव करता है। [२] वानप्रस्थ का मूल कर्त्तव्य प्रभु का उपासन है। जब यह प्रभु की उपासना करता है तो हृदयस्थ प्रभु की ज्ञानवाणियों से इसकी हत्तन्त्री बज उठती है। उन हृत्तन्त्री के स्वरों में यह उपासक स्नात हो उठता है। जैसे एक उत्कृष्ट वाद्य के स्वर में लीन हुआ हुआ पुरुष चित्तवृत्ति को एकाग्र कर पाता है, इसी प्रकार यह उपासक प्रभु में लीन हुआ हुआ चित्तवृत्ति को विषयों में भटकने से बचा पाता है। इस प्रकार यह उन हत्तन्त्री के स्वरों में स्नान करता हुआ शुद्ध जीवनवाला बन जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ–वनस्थ होकर हम प्रभु के उपासन में लीन हो जायें। प्रभु की वाणियों में अपने जीवन को शुद्ध कर डालें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - इतः-अरण्यान्याः स्वरूपमुच्यते (वृषरवाय वदते) मनसि सुखस्य वर्षको रवः शब्दो यस्य यद्वा निरन्तरं मेघवर्षणमिव मधुरो रवः शब्दो यस्य स सूक्ष्मजन्तुः सपक्षो झिल्लीनाम ‘झिङ्गुर-झिङ्गा’ इति भाषायां तस्मै (वदते) तदा वीणावाद्यमिव वदति (चिच्चिकः-यत्-उपावति) चिच् चिक् इति शब्दानुकरणम्, ‘चिच् चिक्’ करोति तत्करोत्यर्थे क्विप्। चिच्-चिक्-अल्पं विरम्य शब्दं करोति सोऽपक्षः सूक्ष्मो जन्तुर्वृक्षासक्तः स च पूर्वस्य वृषरवस्य शब्दमनुपोषति (आघाटिभिः-इव) आघाटकैः स्वरस्योच्चारकैर्गायकै-रिव (धावयन्) स्वरं प्रसारयन्ति गायन्ति “आङ्पूर्वकघटप्रयोगः” घट भाषार्थः [चुरादि०] एवं विविध-वाञ्छितगीतिभिः (अरण्यानि महीयते) अरण्यानी प्रशस्यते ‘अरण्यानिः छान्दसं ह्रस्वत्वम्’ ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In response to howls and noises of the forest, birds chirp and crickets sing, all appears like temple bells and thereby the forest presence gets exalted.