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उप॑ तेऽधां॒ सह॑मानाम॒भि त्वा॑धां॒ सही॑यसा । मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

upa te dhāṁ sahamānām abhi tvādhāṁ sahīyasā | mām anu pra te mano vatsaṁ gaur iva dhāvatu pathā vār iva dhāvatu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उप॑ । ते॒ । अ॒धा॒म् । सह॑मानाम् । अ॒भि । त्वा॒ । अ॒धा॒म् । सही॑यसा । माम् । अनु॑ । प्र । ते॒ । मनः॑ । व॒त्सम् । गौःऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ । प॒था । वाःऽइ॑व । धा॒व॒तु॒ ॥ १०.१४५.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:145» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:3» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे अध्यात्मप्रिय जन ! तेरे लिये (सहमानाम्) कामवासना को दबानेवाली सोम ओषधि को (उप-अधाम्) सहाय्यरूप से समर्पित करती हूँ पीने के लिये (त्वा) तुझे (सहीयसा) बलवान् सोम से (अभि अधाम्) अभिधारण करती हूँ, मैं उपनिषद् अध्यात्मविद्या अपने में धारण करती हूँ। (ते मनः) तेरा मन (माम्-अनु प्र धावतु) मुझे अनुसरण करता हुआ प्रगति करे (गौः-इव वत्सम्) जैसे गौ बछड़े को अनुसरण कर चलती है (वाः यथा धावतु) जल नीचे मार्ग से बहता है तथा मुझ उपनिषद्-अध्यात्मविद्या का अनुसरण कर ॥६॥
भावार्थभाषाः - अध्यात्मविद्या का सहायक सोम ओषधि है, उसे भी अध्यात्मप्रेमी सेवन करे, अध्यात्मविद्या के प्रति अनुराग ऐसा होना चाहिए, जैसे गौ का बछड़े के प्रति, जैसे जल निम्न मार्ग के प्रति बह जाता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वत्सं गौः इव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि मैं (सहमानाम्) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का मर्षण करनेवाली इस आत्मशक्ति को (ते उप अधाम्) = तेरे समीप स्थापित करता हूँ। और इस प्रकार (सहीयसा) = शत्रुओं को प्रबलता से कुचलनेवाले इस बल से (त्वा) = तुझे (अभि अधाम्) = सब ओर से धारण करता हूँ । जिधर से भी शत्रु का आक्रमण हो, यह तेरी आत्मिकशक्ति उसका पराभव करती है । [२] इन शत्रुओं के पराभव के होने पर (मां अनु) = मुझे लक्ष्य करके (ते मनः) = तेरा मन (प्रधावतु) = इस प्रकार दौड़े, इव-जैसे कि वत्सम्-बछड़े का लक्ष्य करके (गौः) = गौ दौड़ती है। गौ को बछड़ा जिस प्रकार प्रिय होता है, इसी प्रकार जीव को प्रभु प्रिय हो । (इव) = जैसे (वा:) = पानी (पथा) = निम्न मार्ग से दौड़ता है इसी प्रकार आत्मविद्या के उपासक का मन प्रभु की ओर चले । पानी स्वभावतः निम्न मार्ग की ओर बहता है, इसी प्रकार हमारी वृत्ति स्वभावतः प्रभु की ओर चलनेवाली हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम आत्मशक्ति सम्पन्न होकर प्रभु की ओर बढ़ चलें । यह सूक्त भोगवृत्ति को नष्ट करके आत्मविद्या की ओर चलने का प्रतिपादन करता है। इस बात के लिये साधनामय जीवन को बितानेवाला 'देवमुनि' अगले सूक्त का ऋषि है। आत्मविद्या के प्रकाश से यह 'देव' है । वाक्संयम रखते हुए विचार करने के कारण यह मुनि है। यह 'इरम्मद' है, गतिशीलता में आनन्द को लेनेवाला है [इर् to go] यह कर्मवीर है नकि वाग्वीर । इसकी साधना एकान्त में चलती है। इस एकान्त की ही प्रतीक 'अरण्यानी' अगले सूक्त की देवता है । अरण्यानी से देवमुनि कहता है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) हे-अध्यात्मप्रिय जन ! तुभ्यं (सहमानाम्-उप-अधाम्) कामवासनाया-अभिभवित्रीं सोमौषधिमुपदधामि सहाय्यरूपेण समर्पयामि पानार्थं (त्वा) त्वां (सहीयसा-अभि अधाम्) बलवता सोमेन-अभिधारयामि-उपनिषदि खल्वध्यात्मविद्यायां स्वस्यां धारयामि (ते मनः) तव मनः (माम्-अनु प्र धावतु) मामनुसरन् प्रगच्छतु (गौः-इव वत्सम्) यथा गौर्वत्समनुप्रगच्छति (वाः-पथा धावतु) यथा जलं निम्नमार्गेण प्रगच्छति तथा मामुपनिषद-मध्यात्मविद्यां प्रगच्छ ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O soma, O spirit of peace, O spiritual knowledge of the Upanishad, I love you at heart and hold on to you in faith, patient and victorious as you are. I hold on to you with a determined mind. May your spirit radiate and come to me like the mother cow hastening to the calf and water rushing straight down to the lake.