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उ॒त वा उ॒ परि॑ वृणक्षि॒ बप्स॑द्ब॒होर॑ग्न॒ उल॑पस्य स्वधावः । उ॒त खि॒ल्या उ॒र्वरा॑णां भवन्ति॒ मा ते॑ हे॒तिं तवि॑षीं चुक्रुधाम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta vā u pari vṛṇakṣi bapsad bahor agna ulapasya svadhāvaḥ | uta khilyā urvarāṇām bhavanti mā te hetiṁ taviṣīṁ cukrudhāma ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । वा॒ । ऊँ॒ इति॑ । परि॑ । वृ॒ण॒क्षि॒ । बप्स॑त् । ब॒होः । अ॒ग्ने॒ । उल॑पस्य । स्व॒धा॒ऽवः॒ । उ॒त । खि॒ल्याः । उ॒र्वरा॑णाम् । भ॒व॒न्ति॒ । मा । ते॒ । हे॒तिम् । तवि॑षीम् । चु॒क्रु॒धा॒म॒ ॥ १०.१४२.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:142» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:30» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत वै-उ) हाँ तो फिर (स्वधावः-अग्ने) हे स्वाधार ज्ञान के प्रकाशक परमात्मन् ! (बहोः-उलपस्य) बहुविध कोमल तृण की भाँति संवरण करनेवाले पाप या अज्ञान के (बप्सत्) स्वोपासक में ज्ञानप्रकाश करता हुआ (परि वृणक्षि) परितः नष्ट करता है (उत) और (उर्वराणां-खिल्याः-भवन्ति) तेरे संसर्ग से श्रेष्ठ भूमिवाले मनुष्यों के खण्डप्रदेश भिन्न-भिन्न अङ्गवाले हो जाते हैं, तेरे प्रसाद से सम्पन्न बन जाते हैं (ते तविषीं हेतिम्) तेरी बलवती  प्रहरणशक्ति को (मा चुक्रुधाम) हम क्रोधित न करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा स्वाधार ज्ञानप्रकाशक है, वह कोमल तृण के समान ढाँपनेवाले अज्ञान या पाप को नष्ट कर देता है, जबकि उपासक में अपना ज्ञानप्रकाश भरता है और जिसकी श्रेष्ठ भूमि आन्तरिक स्थिति होती है, उसके खण्ड-खण्ड या भिन्न-भिन्न अङ्ग परमात्मा के प्रसाद से सुसम्पन्न हो जाते हैं, प्रतिकूल-आचरण से उसकी बलवती प्रहरशक्ति को क्रोधित न करें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपजाऊ को ऊसर न बनाना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = प्रगतिशील (स्वधावः) = आत्मतत्त्व का धारण करनेवाले जीव ! तू (बहोः उलपस्य) = इन विस्मृत विषयरूप तृणों का (बप्सत्) = भक्षण करता हुआ (उत वा उ) = निश्चय से (परिवृणक्षि) = अपने आत्म प्राप्ति के मार्ग को छोड़ देता है। विषयों में फँसा और आत्म प्राप्ति के मार्ग से विचलित हुआ । [२] (उत) = और इस विषय सेवन के परिणामस्वरूप (उर्वराणाम्) = उपजाऊ भूमियों की (खिल्याः) = ऊसर भूमियाँ भवन्ति हो जाती हैं । अर्थात् इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि सब क्षीणशक्ति हो जाती हैं। इन्द्रियों में अपने-अपने कार्य को करने की शक्ति नहीं रह जाती। मन अतृप्त व अशान्त हो जाता है, बुद्धि की गम्भीरता विनष्ट हो जाती है। [३] हे प्रभो ! हम इस प्रकार विषय सेवन से इस सम्पूर्ण क्षेत्र [= शरीर] को ऊसर बनाकर (ते) = आपके (तविषीम्) = प्रबल (हेतिम्) = वज्र को (मा चुक्रुधाम) = कोपित न कर लें। आपके हम क्रोधपात्र कभी न हों। विषयों से दूर रहकर, शरीर क्षेत्र को खूब उर्वर बनाते हुए हम आपके प्रिय बनें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-विषयों में फँसने से हम आत्म प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं। हमारी शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और हम प्रभु के प्रिय नहीं रहते।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उत वै-उ) अपि हि खलु (स्वधावः-अग्ने) हे स्वाधार ज्ञानप्रकाशक परमात्मन् ! (बहोः-उलपस्य-बप्सत् परि वृणक्षि) बहुविधस्य कोमलतृणस्येव संवरणस्य पापस्याज्ञानस्य “वल संवरणे” कप् प्रत्ययात् निपातितः-उलपः, स्वोपासके ज्ञानप्रकाशं कुर्वन् परिवर्जयसि परिनाशयसि (उत) अपि च (उर्वराणां खिल्याः-भवन्ति) तव संसर्गात् खलु श्रेष्ठभूमीनां जनानां खण्डप्रदेशाः-भिन्नभिन्नाङ्गा ये भवन्ति तव प्रसादात् सुसम्पन्ना भवन्ति-भवन्तु (ते तविषीं हेतिं मा चुक्रुधाम) तव बलवतीं प्रहरणशक्तिं न क्रोधयुक्तां कुर्याम ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, self-refulgent fire and power, when you burn and devour heaps of grass, sometimes you spare patches of green and sometimes vast areas of fertile lands become wastelands. Let us understand this mystery and the way so that we do not excite the onslaught of your blazing power of destruction.