पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (ते) = तेरे (पितूयतः) = अन्न की कामनावाले इस उपासक का (जनिमा) = विकास (प्रवत्) = उत्कृष्ट होता है। संसार में जो व्यक्ति प्रभु का उपासक बनता है और अन्न का ही सेवन करता है उसका विकास उत्तम होता है । [२] हे परमात्मन्! आप (साची इव) = सर्वत्र समवेत हुए हुए (विश्वा भुवना) = सब लोकों को (नि ऋञ्जसे) = निश्चय से प्रसाधित करते हैं । पृथिवी आदि सब लोकों में आप समवेत हैं और सब का नियमन कर रहे हैं । [३] (सप्तयः) = हमारे ये इन्द्रियाश्व (प्र सनिषन्त) = आपका सम्भजन करते हैं, तथा (नः धियः) = हमारी ये बुद्धियाँ भी (प्रसनिषन्त) = आपका ही उपासन करती हैं। आँख यदि तारों में प्रभु की व्यवस्था को देखती हैं, नासिका यदि फूलों की गन्ध में प्रभु की महिमा का अनुभव करती है, जिह्वा यदि फलों के रस को आस्वादित करती हुई प्रभु का स्मरण करती है, तो यह सब इन्द्रियों द्वारा प्रभु का सम्भजन हो जाता है। इस प्रकार इन्द्रियों व बुद्धियों से प्रभु का सम्भजन करनेवाले लोग (पशुपाः इव) = ग्वालों के समान, जैसे ग्वाले गौओं को चराते हुए उनके साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, उसी प्रकार ये प्रभु के उपासक भी (त्मना) = स्वयं (पुरः चरन्ति) = आगे और आगे चलते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उपासक के जीवन का उत्कृष्ट विकास होता है। यह इन्द्रियों का रक्षण करता हुआ इन्द्रियों के साथ आगे और आगे बढ़ता है ।