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अ॒यम॑ग्ने जरि॒ता त्वे अ॑भू॒दपि॒ सह॑सः सूनो न॒ह्य१॒॑न्यदस्त्याप्य॑म् । भ॒द्रं हि शर्म॑ त्रि॒वरू॑थ॒मस्ति॑ त आ॒रे हिंसा॑ना॒मप॑ दि॒द्युमा कृ॑धि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayam agne jaritā tve abhūd api sahasaḥ sūno nahy anyad asty āpyam | bhadraṁ hi śarma trivarūtham asti ta āre hiṁsānām apa didyum ā kṛdhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । अ॒ग्ने॒ । ज॒रि॒ता । त्वे इति॑ । अ॒भू॒त् । अपि॑ । सह॑सः । सू॒नो॒ इति॑ । न॒हि । अ॒न्यत् । अस्ति॑ । आप्य॑म् । भ॒द्रम् । हि । शर्म॑ । त्रि॒ऽवरू॑थम् । अस्ति॑ । ते॒ । आ॒रे । हिंसा॑नाम् । अप॑ । दि॒द्युम् । आ । कृ॒धि॒ ॥ १०.१४२.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:142» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:30» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा अपने उपासक के अज्ञान को नष्ट करता है, मोक्षसुख देता है, तीन प्रकार के दुःखों से पृथक् करता है, उसकी सदा रक्षा करता है इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे ज्ञानप्रकाशक परमात्मन् ! (अयं जरिता) यह स्तुति करनेवाला (त्वे-अपि-अभूत्) तेरे अन्दर निमग्न हो जाता है (सहसः सूनो) हे बल के प्रेरक ! (अन्यत्-आप्यम्) अन्य प्राप्तव्य वस्तु (नहि-अस्ति) तुझ से भिन्न नहीं है (ते शर्म भद्रं हि) तेरा शर्म गृह कल्याणरूप ही (त्रिवरूथम्-अस्ति) तीन दुःखों का निवारक है (हिंसानां दिद्युम्) हिंसकों के दीप्यमान शस्त्र को (आरे-अप आ कृधि) दूर कर दे-दूर फेंक दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का स्तुति करनेवाला उसके अन्दर निमग्न हो जाता है, परमात्मा से भिन्न उसकी कोई प्राप्तव्य वस्तु नहीं होती, परमात्मा की शरण कल्याणकारी है और तीन दुखों-अर्थात् आध्यात्मिक, अधिदैविक और अधिभौतिक दुखों का निवारक है, हिंसकों के शस्त्रास्त्र को दूर फेंकता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु ही सच्चे बन्धु हैं

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (अयं जरिता) = यह स्तोता (त्वे अभूत्) = आप में ही होता है। यह सर्वदा आपकी ही शरण को प्राप्त करता है । अपि और हे (सहसः सूनो) = बल के पुत्र, बल के पुञ्ज प्रभो! (अन्यत्) = आप से भिन्न (आप्यम्) = बन्धुत्व (नहि अस्ति) = नहीं है। वस्तुतः आप ही तो बन्धु हैं। अन्य बन्धुत्व तो सब स्वार्थ को लिये हुए हैं। [२] (हि) = निश्चय से (ते शर्म) = आपका रक्षण [शर्म protection] (भद्रम्) = कल्याण व सुख को देनेवाला है तथा (त्रिवरूथं अस्ति) = अध्यात्म, अधिदेव व अधिभूत सम्बन्धी सभी कष्टों का निवारण करनेवाला है। हे प्रभो ! आप (हिंसानाम्) = हिंसक वृत्तिवाले पुरुषों के (दिद्युम्) = वज्र को आरे दूर (अपकृधि) = हमारे से पृथक् करिये। हम इनके वज्र का शिकार न हों। काम, क्रोध, लोभ आदि असुरों के शस्त्रों से हम घायल न किये जायें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु में मग्न रहें। प्रभु को ही अपना बन्धु जानें। प्रभु का रक्षण हमें सब आपत्तियों से बचाता है। प्रभु कृपा से असुरों के अस्त्र हमारे पर प्रहार न करें।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमात्मा निजोपासकस्याज्ञानं छिनत्ति मोक्षसुखं प्रयच्छति, दुःखत्रयात् पृथक् करोति सदा रक्षतीत्यादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे ज्ञानप्रकाशक परमात्मन् ! (अयं जरिता) एष स्तोता “जरिता स्तोतृनाम” [निघ० ३।१६] (त्वे-अपि-अभूत्) त्वयि त्वदन्तरेऽपि गतो निमग्नो जातः (सहसः सूनो) हे बलस्य प्रेरकः ! “य आत्मदा बलदा...” [यजु० २५।१३] (अन्यत्-आप्यम्-नहि-अस्ति) जरितुः स्तोतुर्ममाव्यत् खल्वाप्यं प्राप्तव्यं वस्तु त्वद्भिन्नं नास्ति (ते शर्म भद्रं-हि त्रिवरूथम्-अस्ति) तव शरणं गृहम् “शर्म गृहनाम” [निघ० ३।४] कल्याणरूपं दुःखत्रयस्य वारकमस्ति (हिंसानां-दिद्युम्-आरे-अप आ कृधि) हिंसन्तीति हिंसाः-अच् कर्तरि तेषां दीप्यमानं शस्त्रं दूरे “इषवः वै दिद्यवः” [श० ५।४।२।२] “दिद्युम्-प्रज्वलितं शस्त्रास्त्रम्” [ऋ० ७।५६।९ दयानन्दः] “आरे दूरनाम” [निघ० ३।२६] प्रक्षिप ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O self-refulgent light of life, Agni, this celebrant is dedicated to you wholly in worship and service. O creator and inspirer of strength, patience and fortitude, there is none other than you worth attaining. Blissful is your power of body, mind and soul. Pray cast away the pain and sufferance caused by the burning oppression of violent enemies.