पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (त्वम्) = आप (अग्निभिः) = मातारूपी दक्षिणाग्नि से, पितारूप गार्हपत्य अग्नि से तथा आचार्यरूपी आवहनीय अग्नि से 'पिता वै गार्हपत्योऽग्निः, माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः । गुरुराहवनीयस्तु स्वाग्नित्रेता गरीयसी ॥' [मनु] (नः) = हमारे (ब्रह्म) = ज्ञान को (यज्ञं च) = और यज्ञ को (वर्धय) = बढ़ाइये । उत्तम माता, पिता व आचार्य को प्राप्त करके हमारा ज्ञान बढ़े तथा हमारी प्रवृत्ति यज्ञात्मक कर्मों के करने की हो। [२] (त्वम्) = आप (नः) = हमारे लिये देवतातये दिव्यगुणों के विस्तार के लिये तथा (दानाय) = लोकहित के कार्यों में देने के लिये (रायः) = धनों को (चोदय) = प्रेरित करिये। हमें धन प्राप्त हों। इन धनों से यज्ञादि उत्तम कर्मों को करने में समर्थ होते हुए तथा ज्ञान के साधनों को जुटाते हुए हम अपने में 'यज्ञ व ब्रह्म' का विस्तार कर सकें और इस प्रकार देव बन सकें । तथा साथ ही हम सदा इन धनों का विनियोग लोकहित के कार्यों में दान देने में करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु कृपा से उत्तम माता, पिता व आचार्य को प्राप्त करके हमारे में 'ज्ञान व यज्ञ'का वर्धन हो। हमें प्रभु धन प्राप्त करायें। इन धनों का हम दान में विनियोग करें। I इस सूक्त में धन की प्रार्थना है, उस धन की जो कि हमारे ज्ञान व यज्ञों का वर्धन करे, दान में विनियुक्त हो । निर्धनता के कारण यह व्यक्ति तपस्वी नहीं दिख रहा। धनी होते हुए धन का भोग-विलास में व्यय न करने के कारण यह 'तापस' है। यह धन का मित्र न बनकर प्रभु का मित्र बनता है । इसलिए यह 'जरिता' प्रभु का स्तोता बनता है। यह 'द्रोण' [द्रु अभिगतौ] क्रियाशीलता से वासनाओं पर आक्रमण करनेवाला बनता है । 'सारिसृक्व' गति के द्वारा [सृ] वासनाओं को छोड़नेवाला होता है [सृज्] । 'तिष्ठति इति स्तम्बः ' यह प्रभु का स्थिर मित्र बनने का प्रयत्न करने के कारण 'स्तम्बमित्र' कहलाता है। वासनाओं को शीर्ण करने के कारण 'शार्ङ्ग' कहलाता है, इस वासनाओं को शीर्ण करके यह ' शृंग' अर्थात् शिखर पर पहुँचता है। यह प्रभु की आराधना करता हुआ कहता है-