प्रभु स्मरण व सुख प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (जनाः) = मनुष्य (सुम्नाय) = सुख प्राप्ति के लिए (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को (पुरः दधिरे) = सामने धारण करते हैं । उसका स्तवन करते हुए उसके गुणों को अपनाने का प्रयत्न करते हैं । वस्तुतः सुख प्राप्ति का मार्ग यही है कि हम प्रभु का स्मरण करें, प्रभु जैसा बनने का प्रयत्न करें। जो प्रभु (ऋतावानम्) = ऋतवाले हैं, यज्ञवाले हैं, जिनके सब कर्म ऋत [ठीक] हैं। [ख] (महिषम्) = महान् हैं, पूजनीय हैं । [ग] (विश्वदर्शतम्) = सम्पूर्ण विश्व को देखनेवाले हैं। इस प्रकार प्रभु का स्मरण करते हुए हम भी ऋत का पालन करें, महान् बनें औरों का ध्यान करके कर्म करें, हमारे कर्म स्वार्थ को लिए हुए न हों। [२] हे प्रभो ! (त्वा) = आप को गिरा इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा (मानुषा युगा) = मनुष्यों के युग [जोड़े] अर्थात् पति-पत्नी स्मरण करते हैं। जो आप (श्रुत्कर्णम्) = ज्ञान का विस्तार करनेवाले हैं [कृ विक्षेपे], (सप्रथस्तमम्) = अत्यन्त विस्तारवाले हैं, सारे ब्रह्माण्ड को ही आप अपने एक देश में लिए हुए हैं। (दैव्यम्) = जो आप देववृत्ति के लोगों को प्राप्त होनेवाले हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्मरण करते हुए प्रभु जैसा बनने का प्रयत्न करें। यही सुख प्राप्ति का मार्ग है । सम्पूर्ण सूक्त का भाव भी यही है कि हम प्रभु स्मरण से पवित्र बनते हैं। हमें धन प्राप्त होता है, पर उस धन का विनियोग हम यज्ञादि उत्तम कर्मों में करते हैं। हमें शक्ति प्राप्त होती है, उसका प्रयोग हम रक्षण में करते हैं। हमारा जीवन भोगमार्ग पर न जाकर योगमार्ग पर चलनेवाला होता है। हम तपस्वी होते हैं, आगे बढ़ते चलते हैं। यह 'अग्निः तापसः ' ही अगले सूक्त का ऋषि है। यह प्रभु की अनुकूलता की प्रार्थना करता हुआ कहता है-