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इ॒र॒ज्यन्न॑ग्ने प्रथयस्व ज॒न्तुभि॑र॒स्मे रायो॑ अमर्त्य । स द॑र्श॒तस्य॒ वपु॑षो॒ वि रा॑जसि पृ॒णक्षि॑ सान॒सिं क्रतु॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

irajyann agne prathayasva jantubhir asme rāyo amartya | sa darśatasya vapuṣo vi rājasi pṛṇakṣi sānasiṁ kratum ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒र॒ज्यन् । अ॒ग्ने॒ । प्र॒थ॒य॒स्व॒ । ज॒न्तुऽभिः॑ । अ॒स्मे इति॑ । रायः॑ । अ॒म॒र्त्य॒ । सः । द॒र्श॒तस्य॑ । वपु॑षः । वि । रा॒ज॒सि॒ । पृ॒णक्षि॑ । सा॒न॒सिम् । क्रतु॑म् ॥ १०.१४०.४

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:140» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:4


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अमर्त्य-अग्ने) हे अमर अग्रणायक परमात्मन् ! (जन्तुभिः-इरज्यन्) उत्पन्न पदार्थों से ऐश्वर्यों को प्राप्त हुआ वर्तमान है (अस्मे) हमारे लिये (रायः) धनों को (प्रथयस्व) फैला-विस्तार करो (सः) वह तू (दर्शतस्य वपुषः) दर्शनीय रूप का (विराजसि) विशिष्ट स्वामी है उससे विराजमान है (सानसिं क्रतुम्) संभजनीय कर्मफल को (पृणक्षि) पूरण करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - अमर परमात्मा पदार्थों को उत्पन्न करके उन पर स्वामित्व करता है, मनुष्यों के लिए धनादि भोग्य वस्तुओं का विस्तार करता है, कर्मों के अनुसार फलप्रदान करता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धन-सौन्दर्य- शक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् (अमर्त्य) = कभी नष्ट न होनेवाले प्रभो! आप (इरज्यन्) = सब ऐश्वर्यों के स्वामी होते हुए (अस्मे) = हमारे लिये (जन्तुभिः) = गौ इत्यादि पशुओं के द्वारा (रायः) = धनों का (प्रथयस्व) = विस्तार कीजिये। इन गवादि पशुओं से कृषि गोरक्षा वाणिज्य आदि को करते हुए हम अपने धनों को बढ़ानेवाले हों। अथवा 'जन्तुभिः' का भाव यह भी हो सकता है कि (हमारे पोषणीय प्राणियों) के अनुसार हमें धन दीजिये। हमें अधिक प्राणियों का पोषण करना है तो अधिक धन, कम का पोषण करना है तो कम धन । व्यर्थ का धन होना, आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी न पड़े। अतिरिक्त धन तो विलास का ही कारण बना करता है। इस धन से हम उन्नत हों [अग्नि] असमय की मृत्यु से बचें [अमर्त्य] । [२] हे प्रभो ! आप (दर्शतस्य) = दर्शनीय (वपुषः) = सौन्दर्य के व सुन्दर शरीर के (विराजसि) = राजा हैं। आप हमें उचित धनों को प्राप्त कराके इस योग्य बनायें कि हम शरीर को स्वस्थ व सुन्दर बना सकें। आप हमारे में (सानसिं क्रतुम्) = सम्भजनीय यज्ञों का व शक्ति का (पृणक्षि) = पूरण करते हैं । क्रतु शब्द यज्ञ का वाचक है, साथ ही शक्ति का भी प्रतिपादन करता है । सम्भजनीय शक्ति वह है जो कि रक्षण में विनियुक्त होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें पर्याप्त धन दें । सुन्दर शरीर व सम्भजनीय शक्ति को प्राप्त करायें। यह शक्ति व धन यज्ञादि उत्तम कर्मों में ही व्ययित हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अमर्त्य-अग्ने) हे अमर ! अग्रणायक परमात्मन् ! (जन्तुभिः-इरज्यन्) जायमानपदार्थैरैश्वर्यमाप्नुवन् “इरज्यति ऐश्वर्यकर्मा” [निघ० २।२१] (अस्मे) अस्मभ्यं (रायः प्रथयस्व) धनानि प्रसारय (सः) स त्वं (दर्शतस्य वपुषः वि राजसि) दर्शनीयस्य रूपस्य विशिष्टः स्वामी भवसि-दर्शनीयेन रूपेण विराजसे-इत्यर्थः (सानसिं क्रतुं पृणक्षि) सम्भजनीयं कर्मफलं पूरयसि ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Immortal Agni, waxing and exalting with all living beings, develop and expand the wealth and excellence of life for us. Of noble and gracious form as you are and shine and rule as you do, join us with yajnic action and bless us with abundant fruit of success and victory.