पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् (अमर्त्य) = कभी नष्ट न होनेवाले प्रभो! आप (इरज्यन्) = सब ऐश्वर्यों के स्वामी होते हुए (अस्मे) = हमारे लिये (जन्तुभिः) = गौ इत्यादि पशुओं के द्वारा (रायः) = धनों का (प्रथयस्व) = विस्तार कीजिये। इन गवादि पशुओं से कृषि गोरक्षा वाणिज्य आदि को करते हुए हम अपने धनों को बढ़ानेवाले हों। अथवा 'जन्तुभिः' का भाव यह भी हो सकता है कि (हमारे पोषणीय प्राणियों) के अनुसार हमें धन दीजिये। हमें अधिक प्राणियों का पोषण करना है तो अधिक धन, कम का पोषण करना है तो कम धन । व्यर्थ का धन होना, आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी न पड़े। अतिरिक्त धन तो विलास का ही कारण बना करता है। इस धन से हम उन्नत हों [अग्नि] असमय की मृत्यु से बचें [अमर्त्य] । [२] हे प्रभो ! आप (दर्शतस्य) = दर्शनीय (वपुषः) = सौन्दर्य के व सुन्दर शरीर के (विराजसि) = राजा हैं। आप हमें उचित धनों को प्राप्त कराके इस योग्य बनायें कि हम शरीर को स्वस्थ व सुन्दर बना सकें। आप हमारे में (सानसिं क्रतुम्) = सम्भजनीय यज्ञों का व शक्ति का (पृणक्षि) = पूरण करते हैं । क्रतु शब्द यज्ञ का वाचक है, साथ ही शक्ति का भी प्रतिपादन करता है । सम्भजनीय शक्ति वह है जो कि रक्षण में विनियुक्त होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें पर्याप्त धन दें । सुन्दर शरीर व सम्भजनीय शक्ति को प्राप्त करायें। यह शक्ति व धन यज्ञादि उत्तम कर्मों में ही व्ययित हो ।