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अग्ने॒ तव॒ श्रवो॒ वयो॒ महि॑ भ्राजन्ते अ॒र्चयो॑ विभावसो । बृह॑द्भानो॒ शव॑सा॒ वाज॑मु॒क्थ्यं१॒॑ दधा॑सि दा॒शुषे॑ कवे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne tava śravo vayo mahi bhrājante arcayo vibhāvaso | bṛhadbhāno śavasā vājam ukthyaṁ dadhāsi dāśuṣe kave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑ । तव॑ । श्रवः॑ । वयः॑ । महि॑ । भ्रा॒ज॒न्ते॒ । अ॒र्चयः॑ । वि॒भा॒व॒सो॒ इति॑ विभाऽवसो । बृह॑द्भानो॒ इति॒ बृह॑त्ऽभानो । शव॑सा । वाज॑म् । उ॒क्थ्यृ॑अ॑म् । दधा॑सि । दा॒शुषे॑ । क॒वे॒ ॥ १०.१४०.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:140» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में परमात्मा आत्मसमर्पी स्तुतिकर्त्ता को मोक्ष में पहुँचाता है, वहाँ अमृतान्न भोग देता है, सबके लिये भोग्य वस्तु भी, संसार का उत्पादक, रक्षक है, उसका श्रवण वेद से किया जाता है, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (विभावसो) हे विशिष्ट दीप्ति से बसनेवाले (अग्ने) अग्रणायक परमात्मन् ! (तव) तेरा (महि श्रवः) महान् सुनने योग्य वेदप्रवचन (वयः) विज्ञानरूप (अर्चयः) ज्ञानदीप्तियाँ (भ्राजन्ते) प्रकाशित हो रहे हैं (बृहद्भानो कवे) हे महान् तेजस्वी सर्वज्ञ परमात्मन् ! (शवसा) आत्मबल से (दाशुषे) अपने आत्मा को दे-चुकनेवाले-आत्मसमर्पी उपासक के लिए (उक्थ्यं वाजं दधाति) प्रशंसनीय मोक्ष का अमृतान्नभोग देता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा विशेष ज्ञानदीप्ति से बसनेवाला है, उसका श्रवण करने योग्य वेद और विज्ञान है, उसकी ज्ञानदीप्तियाँ संसार के पदार्थों में प्रकाशित हैं, वह आत्मसमर्पी उपासक के लिए प्रशंसनीय मोक्ष का अमृतान्नभोग देता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्रव-वय-अर्चि [ज्ञान-शक्ति-दीप्ति]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (विभावसो) = ज्ञान प्रकाशरूप धनवाले प्रभो ! (तव) = आपका (श्रवः) = ज्ञान (वयः) = [onegy, sltength] शक्ति तथा (अर्चयः) = दीप्तियाँ महि भ्राजन्ते खूब ही दीप्त होती हैं । आपकी उपासना करता हुआ मैं ज्ञान शक्ति व दीप्ति को प्राप्त करनेवाला बनता हूँ। [२] हे (बृहद्धानो) = महान् दीसिवाले (कवे) = क्रान्तदर्शिन् सर्वज्ञ प्रभो! आप (दाशुषे) = आत्मार्पण करनेवाले के लिए (शवसा) = बल के साथ (उक्थ्यम्) = उत्तम स्तुतिवाले (वाजम्) = ज्ञानैश्वर्य को (दधासि) = धारण करते हैं। यहाँ 'शवस्' बल को कहता है, तो 'उक्थ्यं' = स्तुति का संकेत कर रहा है और 'वाज' शब्द ज्ञानैश्वर्य का प्रतिपादक है। प्रभु उपासक को 'बल, स्तुति की प्रवृत्ति व ज्ञान' तीनों ही चीजें प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु अपने उपासक को शरीर में शक्ति सम्पन्न मन में स्तुत्य वृत्तिवाला व मस्तिष्क में ज्ञानोज्ज्वल बनाते हैं।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते परमात्मा आत्मसमर्पिणे स्तोत्रे मोक्षं प्रयच्छति, अमृतान्नभोगं ददाति, सर्वेभ्यो भोग्यं वस्तु च, संसारस्योत्पादयिता पालकश्च तस्य श्रवणं वेदाद्गृह्यत इत्यादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (विभावसो-अग्ने) हे विशिष्टदीप्त्या वासशील ! अग्रणायक परमात्मन् ! (तव महि श्रवः-वयः) तव महत् खलु शृण्वन्ति सर्वा विद्याः-येन तद्वेदप्रवचनम् “श्रवः शृण्वन्ति सर्वा विद्याः येन” [ऋ० १।४०।४ दयानन्दः] वयः-विज्ञानम् “वयः विज्ञानम्” [ऋ० १।७१।७ दयानन्दः] (अर्चयः) ज्ञानदीप्तयः (भ्राजन्ते) प्रकाशन्ते (बृहद्भानो कवे) हे महत्तेजस्विन् सर्वज्ञ परमात्मन् ! (शवसा) आत्मबलेन (दाशुषे) आत्मानं दत्तवते (उक्थ्यं वाजं दधासि) प्रशंसनीयममृतान्नं धारयसि ददासीत्यर्थः “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै० २।१९३] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, leading light of life, great is your vigour, power and felicity, shining, inspiring and incessantly flowing. O refulgent lord, your flames rise high and blaze fiercely. Light and fire of Infinity, omniscient poet and creator, by your power, potential and abundance, you bear and bring admirable food, energy and fulfilment with the sense of victory for the generous giver and selfless yajaka.