वांछित मन्त्र चुनें

अङ्गि॑रोभि॒रा ग॑हि य॒ज्ञिये॑भि॒र्यम॑ वैरू॒पैरि॒ह मा॑दयस्व । विव॑स्वन्तं हुवे॒ यः पि॒ता ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aṅgirobhir ā gahi yajñiyebhir yama vairūpair iha mādayasva | vivasvantaṁ huve yaḥ pitā te smin yajñe barhiṣy ā niṣadya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अङ्गि॑रःऽभिः । आ । ग॒हि॒ । य॒ज्ञिये॑भिः । यम॑ । वै॒रू॒पैः । इ॒ह । मा॒द॒य॒स्व॒ । विव॑स्वन्तम् । हु॒वे॒ । यः । पि॒ता । ते॒ । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । ब॒र्हिषि॑ । आ । नि॒ऽसद्य॑ ॥ १०.१४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:14» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:5


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञियेभिः-वैरूपैः-अङ्गिरोभिः-यम-आगहि इह मादयस्व) यज्ञ के योग्य नानाविध सायं-प्रातः, अमावस्या, पूर्णिमा, आदि सन्धियों के मुहूर्तरूप कालावयवों के साथ हे समय ! तू प्राप्त हो और इस यज्ञ में हमको अपने लाभ से तृप्त कर (यः ते पिता तं विवस्वन्तं बर्हिष्या निषद्य-अस्मिन् यज्ञे हुवे) और जो तेरा पिता सूर्यदेव है, उसका भी मैं आसनोपविष्ट इस यज्ञ में आहुतिप्रदान द्वारा प्रयोग करता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - भिन्न-भिन्न पर्व दिवसों में जबकि सूर्यरश्मियाँ भी यज्ञ में संयुक्त हों, ऐसे स्थान पर पार्वण यज्ञ समयानुकूल बनाने के लिए करने चाहिये ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत्संग व यज्ञ में स्थिति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (यम) = संयमी जीवन वाले पुरुष तू (इह) = इस जीवन में (अंगिरोभिः) = सदा क्रियाशील जीवन वाले और अतएव अंग-प्रत्यंग में रस वाले, (यज्ञियेभिः) = यज्ञशील व संगतिकरण योग्य, (वैरूपैः) = विशिष्ट तेजस्वी रूप वाले पुरुषों के साथ (आगहि) = आनेवाला हो, ऐसे पुरुषों के साथ ही तेरा उठना-बैठना हो। उन्हीं के साथ (मादयस्व) = तू आनन्द का अनुभव कर । [२] इन 'अंगरिस् - यज्ञिय-वैरूप' पुरुषों के संग से तेरा जीवन भी यज्ञमय व वासनाओं से ऊपर उठा हुआ हो । तू (अस्मिन् यज्ञे) = इस यज्ञमय जीवन में तथा (बर्हिषि) = वासना शून्य हृदय में [उद् बृह् = उखाड़ना] उस हृदय में, जिसमें से कि वासनाओं को उखाड़ दिया गया है, आनिषद्य स्थित होकर (विवस्वन्तम्) = ज्ञान की किरणों वाले प्रभु को (हुवे) = प्रकारनेवाला हो, (यः ते पिता) = जो तेरे पिता हैं। वस्तुतः हमें यही चाहिए कि हम अपने जीवन को यज्ञमय बनाएँ, हृदय को वासनाशून्य करें । इन्हीं में स्थित होकर प्रभु का उपासन करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा संग सदा उत्तम हो, जीवन यज्ञमय हो, और हम प्रभु का उपासन करने [पुकारने] वाले हों ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञियेभिः-वैरूपैः-अङ्गिरोभिः-यम-आ गहि इह मादयस्व) यज्ञार्हैर्यज्ञयोग्यैर्विभिन्नरूपैरङ्गिरोभिः-सायम्प्रातरमावस्यापौर्णमास्यादि-सन्धि-समप्राणैः कालावयवैः सह हे समय ! त्वमागह्यागच्छ तथाऽऽगत्येहास्मिन् यज्ञेऽस्मान्मादयस्व तर्पय (यः-ते पिता तं विवस्वन्तं बर्हिष्या निषद्य-अस्मिन् यज्ञे हुवे) यश्च ते पिता विवस्वान् सूर्योऽस्ति तमहमासनमुपविश्योपविष्टः सन्नस्मिन् क्रियमाणे यज्ञे हुवे-आहुतिप्रदानेनाददे युनज्मि। ‘अत्र हु धातुरादानार्थः’ “हु दानादनयोरादाने च” [जुहोत्यादिः] ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Yama, life time of health and age, come with pranic energies of nature of various and versatile sort worthy of union and assimilation according to time and seasons, be happy and rejoice with me. I invoke the refulgent Sun also, your generative father, and pray come and be seated in the holy heart core of this life yajna of mine for a full age of good health and joy. (Reference may be made to Atharva Veda 3, 8, 1: May the sun come with its rays joining and entering the earth and energising it according to the seasons. Rgveda 1, 71, 2 throws further light on the science of health and solar rays in relation to the earth and global atmosphere.)