पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (यम) = संयमी पुरुष ! (हि) = निश्चय से (इमं प्रस्तरम्) = इस पत्थर के समान दृढ़ शरीर में (आसीद) = बैठ, निवास करनेवाला बन । शरीर को दृढ़ बनाना मनुष्य का मौलिक कर्तव्य है। जिस प्रकार बाग की चारदिवारी का मजबूत होना अत्यावश्यक है, उसी प्रकार शरीर का दृढ़ होना आवश्यक है। इस शरीर की दृढ़ता के लिये साधन 'यम' शब्द से संकेतित हो रहा है, मनुष्य संयमी बनेगा तभी शरीर को दृढ़ बना पायेगा । संयम द्वारा शरीर के दृढ़ होने पर ही मनुष्य मन व बुद्धि की उन्नति कर सकता है। [२] इस मानस व बौद्धिक उन्नति के लिये (अंगिरोभिः) = [अगि गतौ ] गतिशील (पितृभिः) = पालनात्मक कर्मों में लगे हुए व्यक्तियों से (संविदानः) = मिलकर तू ज्ञानचर्चा करनेवाला बन । आलसियों के साथ तेरा उठना-बैठना न हो, और ना ही तोड़-फोड़ के कामों में रुचि वालों के साथ तू मिल-जुल । क्योंकि जैसों के साथ तेरा संग होगा वैसा ही तो तू बनेगा । इसी दृष्टिकोण से यह प्रार्थना है कि 'यथा नः सर्व इज्जनः संगत्या सुभना असत् ' = सत्संग से हमारे सब लोग उत्तम मन वाले हों। [३] सत्संग से सुमन बने हुए (त्वा) = तुझ को (कविशस्ताः) = महान् कवि-आनन्ददर्शी प्रभु से उपदिष्ट (मन्त्राः) = ज्ञान की वाणियाँ (आवहन्तु) = जीवन के मार्ग में ले चलनेवाली हों । अर्थात् तेरा जीवन का कार्यक्रम श्रुति के अनुकूल हो । 'मंत्र श्रुत्यं चरन्नसि'-मन्त्रों में जैसा हम सुनते हैं, उसके अनुसार हम जीवन को चलानेवाले हों। [४] हे (राजन्) = इन वेदवाणियों के अनुसार व्यवस्थित जीवन [regulated]। वाले पुरुष ! तू (एना) = इस (हविषा) = हवि के द्वारा (मादयस्य) = आनन्द का अनुभव कर । अर्थात् तुझे देकर के बचे हुए को खाने में आनन्द का अनुभव हो। तू सदा हवि का सेवन करनेवाला बन । इस हवि के सेवन से ही तो वस्तुतः तू प्रभु का उपासक बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संयम से हम शरीर को पत्थर के समान दृढ़ बनावें, गतिशील व रक्षणात्मक कार्यों में लगे हुए पुरुषों के साथ हमारा संग हो । वेदज्ञान के अनुसार हम जीवन को बनायें । हवि के सेवन में आनन्द का अनुभव करें।