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देवता: यमः ऋषि: यमः छन्द: निचृत्त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

य॒मो नो॑ गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्त॒वा उ॑ । यत्रा॑ न॒: पूर्वे॑ पि॒तर॑: परे॒युरे॒ना ज॑ज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑ अनु॒ स्वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yamo no gātum prathamo viveda naiṣā gavyūtir apabhartavā u | yatrā naḥ pūrve pitaraḥ pareyur enā jajñānāḥ pathyā anu svāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य॒मः । नः॒ । गा॒तुम् । प्र॒थ॒मः । वि॒वे॒द॒ । न । ए॒षा । गव्यू॑ति॒र् अप॑ऽभ॒र्त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । यत्र॑ । नः॒ । पूर्वे॑ । पि॒तरः॑ । प॒रा॒ऽई॒युः । ए॒ना । ज॒ज्ञा॒नाः । प॒थ्याः॑ । अनु॑ । स्वाः ॥ १०.१४.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:14» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यमः नः गातुं प्रथमः विवेद) समय ने ही हमारी जीवनगति को प्रथम से ही प्राप्त किया हुआ है, अत एव (एषा गव्यूतिः-न-अपभर्तवा-उ) यह कालमार्ग किसी तरह त्यागा नहीं जा सकता (यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः) जिस मार्ग में हमसे पूर्व उत्पन्न जनक आदि पालक जन भी कुलपरम्परा से यात्रा करते चले आये हैं और (एना जज्ञानाः स्वाः पथ्या-अनु) इसी मार्ग से उत्पन्न हुए सभी प्राणी और वनस्पति आदि पदार्थ निज मार्गसंबन्धी धर्मों का अनुगमन करते हैं, अत एव उस समय को पूर्वमन्त्रानुसार होम द्वारा स्वानुकूल बनाना चाहिए ॥२॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक प्राणी के गर्भकाल ने ही जीवन की गति को आरम्भ कर दिया है। यावत् शरीरपात हो यह जीवनगति चलती रहती है। उस काल के अधीन होकर जनक आदि भी यात्रा करते हैं, अपितु संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ अपनी-अपनी प्रकृति, योनि किंवा कर्मानुसार परिणाम और पुष्प-फलादि को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह यात्रा सबके लिए अवश्यम्भावी है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मार्ग का आक्रमण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (प्रथमः यमः) = [ प्रथविस्तारे] सम्पूर्ण जगत् में विस्तृत अर्थात् उस सर्वव्यापक व सर्वनियामक प्रभु ने (नः) = हमें (गातुम्) = मार्ग का विवेद ज्ञान दिया है। (उ) = निश्चय से (एषा गव्यूतिः) = यह मार्ग (अपभर्तवा) = अपहरण के लिये (न) = नहीं होता । अर्थात् उस सर्वव्यापक [प्रथमः ] सर्वनियामक [यमः] प्रभु से उपदिष्ट मार्ग पर चलने से हम इस संसार में विषयों से आकृष्ट नहीं हो जाते । [२] यह वह मार्ग है (यत्रा) = जिस पर (नः) = हमारे (पूर्वे) = अपना पूरण करनेवाले (पितरः) = रक्षणात्मक कार्यों में लगे हुए लोग (परेयुः) = चले हैं। वस्तुतः इस प्रभु से उपदिष्ट मार्ग पर चलने से ही वे अपना पूरण कर पाये हैं। इस मार्ग ने उनके जीवनों में न्यूनताओं को नहीं आने दिया । [३] (एना) = इस मार्ग से चलने के द्वारा (जज्ञाना:) = [ जनी प्रादुर्भावे] अपनी शक्तियों का प्रादुर्भाव व विकास करनेवाले लोग ही (पथ्या:) = [पथि साधवः] उत्तम मार्ग पर चलनेवाले होते हैं और (अनुस्वा:) = उस प्रभु के अनुकूल व प्रिय होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु से उपदिष्ट मार्ग पर ही चलना चाहिए। यही मार्ग हमारे पूरण व विकास के लिये होता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यमः-नः-गातुं प्रथमः-विवेद) यमः-कालो नः-अस्माकं गातुम्-गमनम्-गतिम् “गातुं गमनम्” [निरु०४।२१] प्रथमः सन् विवेद-लब्धवान् “विद्लृ लाभार्थोऽत्र’ अस्माकं जीवनगतिं प्रारम्भिकः समयः प्राप्तवानित्यर्थः। (एषा गव्यूतिः न-अपभर्तवा उ ) एषा गव्यूतिरेष मार्गो नैवापहर्तव्यस्त्यक्तुं शक्यः “कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः” [अष्टा०३।४।१४] (यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः) यस्मिन् मार्गेऽस्माकं पूर्वे पितरोऽस्मदपेक्षया पूर्वे जनकादयः पालयितृजनाः परेयुः-परागच्छन्ति कुलपरम्परया यात्रां कुर्वन्ति ‘परेयुरिति सामान्ये काले लिट्’ (एना जज्ञानाः स्वाः पथ्या-अनु) अनेनैव मार्गेण जाता उत्पन्नाः सर्वेऽपि पदार्थाः स्वाः-निजान् मार्गे भवान् धर्मान् “भवे छन्दसि” [अष्टा०४।४।११०] अनुगच्छन्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Time, first and highest of existence, knows as it comprehends our course of life, and that course no one can avoid, escape, alter or alternate, and that same is the path by which our earlier forefathers went their way, and that is the path by which all who are bom go their way, knowing according to their Dharma and choice. Honour that time with homage.